Saturday, 24 June 2017

शांडिल्य गोत्र सरयूपारीण ब्रह्मण

शांडिल्य गोत्र सरयूपारीण ब्रह्मण | Shandilya Gotra Saryuparin Brahman मंगलवार, 17 मार्च 2015 विवाह आदि संस्कारों में और साधारणतया सभी धार्मिक कामों में गोत्र प्रवर और शाखा आदि की आवश्यकता हुआ करती है। इसीलिए उन सभी का संक्षिप्त विवरण आवश्यक हैं। समान गोत्र प्रवर की कन्या के साथ विवाह करने से जो संतान होती है वह चाण्डाल श्रेणी में गिनी जानी चाहिए। जैसा कि यमस्मृति का वचन हैं कि: आरूढपतितापत्यं ब्राह्मण्यां यश्‍चशूद्रज:। सगोत्रोढासुतश्‍चैव चाण्डालास्त्रायईरिता:॥ ‘संन्यासी का पुत्र, ब्राह्मणी स्त्री से शूद्र का पुत्र और समान गोत्र वाली कन्या से विवाह कर के जन्माया पुत्र, ये तीनों चाण्डाल कहाते हैं’ पर देखते हैं कि सभी देशों के ब्राह्मण आदि समाजों में ऐसा बहुधा होता है। यहाँ तक कि बहुतों को तो गोत्र का ज्ञान भी नहीं होता। प्रवर, शाखा आदि की बात ही दूर रहे। और विवाह गोत्र भिन्न रहने पर भी यदि प्रवरों की एकता हो जावे तो भी नहीं होना चाहिए। गोत्र नाम है कुल, संतति, वंश, वर्ग का। यद्यपि पाणिनीय सूत्रों के अनुसार 'अपत्यं पौत्राप्रभृतिगोत्रम्' 4-1-162, पौत्रा आदि वंशजों को गोत्र कहते हैं। तथापि वह सिर्फ व्याकरण के लिए संकेत है। इसी प्रकार यद्यपि वंश या संतति को ही गोत्र कहते हैं तथापि विवाह आदि में जिस गोत्र का विचार है वह भी सांकेतिक ही है और सिर्फ विश्‍वामित्रा, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, अत्रि, वसिष्ठ, कश्यप और अगस्त्य, इन आठ ऋषियों या इनके वंशज ऋषियों की ही गोत्र संज्ञा है। जैसाकि बोधयन के महाप्रवराध्याय में लिखा है कि : विश्‍वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतम:। अत्रिवर्सष्ठि: कश्यपइत्येतेसप्तर्षय:॥ सप्तानामृषी- णामगस्त्याष्टमानां यदपत्यं तदोत्रामित्युच्यते॥ इस तरह आठ ऋषियों की वंश-परम्परा में जितने ऋषि (वेदमन्त्र द्रष्टा) आ गए वे सभी गोत्र कहलाते हैं। और आजकल ब्राह्मणों में जितने गोत्र मिलते हैं वह उन्हीं के अन्तर्गत है। सिर्फ भृगु, अंगिरा के वंशवाले ही उनके सिवाय और हैं जिन ऋषियों के नाम से भी गोत्र व्यवहार होता है। इस प्रकार कुल दस ऋषि मूल में है। इस प्रकार देखा जाता है कि इन दसों के वंशज ऋषि लाखों हो गए होंगे और उतने ही गोत्र भी होने चाहिए। तथापि इस समय भारत में तो उतने गोत्रों का पता है नहीं। प्राय: 80 या 100 गोत्र मिलते हैं। जो गोत्र के नाम से ऋषि आए हैं वही प्रवर भी कहाते हैं। ऋषि का अर्थ है वेदों के मंत्रों को समाधि द्वारा जाननेवाला। इस प्रकार प्रवर का अर्थ हुआ कि उन मन्त्रद्रष्टा ऋषियों में जो श्रेष्ठ हो। प्रवर का एक और भी अर्थ है। यज्ञ के समय अधवर्यु या होता के द्वारा ऋषियों का नाम ले कर अग्नि की प्रार्थना की जाती है। उस प्रार्थना का अभिप्राय यह है कि जैसे अमुक-अमुक ऋषि लोग बड़े ही प्रतापी और योग्य थे। अतएव उनके हवन को देवताओं ने स्वीकार किया। उसी प्रकार, हे अग्निदेव, यह यजमान भी उन्हीं का वंशज होने के नाते हवन करने योग्य है। इस प्रकार जिन ऋषियों का नाम लिया जाता है वही प्रवर कहलाते हैं। यह प्रवर किसी गोत्र के एक, किसी के दो, किसी के तीन और किसी के पाँच तक होते हैं न तो चार प्रवर किसी गोत्र के होते हैं और न पाँच से अधिक। यही परम्परा चली आती हैं। पर, मालूम नहीं कि ऐसा नियम क्यों हैं? ऐसा ही आपस्तंब आदि का वचन लिखा है। हाँ, यह अवश्य है कि किसी ऋषि के मत से सभी गोत्रों के तीन प्रवर होते हैं। जैसा कि : त्रीन्वृणीते मंत्राकृतोवृणीते॥ 7॥ अथैकेषामेकं वृणीते द्वौवृणीते त्रीन्वृणीते न चतुरोवृणीते न पंचातिवृणीते॥ 8॥ जो दस गोत्र कर्ता ऋषि मूल में बताए गए हैं, उनके वंश का विस्तार बहुत हुआ और आगे चल कर जहाँ-जहाँ से एक-एक वंश की शाखा अलग होती गई वहाँ से उसी शाखा का नाम गण कहलाता है और उस शाखा के आदि ऋषि के नाम से ही वह गण बोला जाता है। इस प्रकार उन दस ऋषियों के सैकड़ों गण हो गए हैं और साधारणतया यह नियम है कि गणों के भीतर जितने गोत्र हैं न तो उनका अपने-अपने गण-भर में किसी दूसरे के साथ विवाह होता है और न एक मूल ऋषि के भीतर जितने गण हैं उनका भी परस्पर विवाह हो सकता है। क्योंकि सबका मूल ऋषि एक ही है। हाँ, भृगु और अंगिरा के जितने गण हैं उनमें हरेक का अपने गण के भीतर तो विवाह नहीं हो सकता पर, गण से बाहर दूसरे गण में तभी विवाह होगा जबकि दोनों के प्रवर एक न हो जावे। प्रवर एक होने का भी यह अर्थ नहीं कि दोनों के 3 या 5 जितने प्रवर हैं सब एक ही रहें। बल्कि यदि दोनों के तीन ही प्रवर हों और उनके दो ऋषि दोनों में हों तो यह प्रवर एक ही कहलाएगा। इसी प्रकार यदि पाँच प्रवर हों तो तीन के एक होने से ही एक होगा। सारांश, आधे से अधिक ऋषि यदि एक हों तो समान प्रवर हो जाने से विवाह नहीं होना चाहिए। जैसा कि बोधयन ने लिखा है : द्वयार्षेयसन्निपातेऽविवाहस्त्रयार्षेयाणांत्रयार्षेयसन्निपातेऽविवाह:प×चार्षेयाणामसमानप्रवरैर्विवाह:॥ इसीलिए बोधयन आदि ने गोत्र का जो सांकेतिक अर्थ किया है उसमें भृगु और अंगिरा को न कह कर आठ ही को गिनाया है, नहीं तो जैसे अत्रि आदि के गणों में जहाँ तक एक गोत्र कर्ता ऋषि उनके किसी भी गोत्र के प्रवरों में विद्यमान रहे वह वास्तव में एक ही गोत्र कहलाते हैं, चाहे व्यवहार के लिए भिन्न ही क्यों न हों और चाहे उनके प्रवर तीन हों या पाँच। उसी प्रकार भृगु और अंगिरा के भी गणों के प्रवरों में सिर्फ एक ही ऋषि के समान होने से ही उनके तीन और पाँच प्रवरवाले गोत्रों का विवाह नहीं हो पाता। मगर अब हो सकता है। क्योंकि एक ऋषि की समानता का नियम सिर्फ आठ ही ऋषियों के लिए है, न कि भृगु और अंगिरा के लिए भी। जैसा कि - एक एव ऋषिर्यावत्प्रवरेष्वनुवर्त्तते। तावत्समानगोत्रत्वमन्यत्रांगिरसोभृगो:॥ भृगु और अंगिरा के वंशजों के जो गण है उसमें कुछ तो गोत्र के उन आठ ऋषियों के ही गण में आ गए हैं और कुछ अलग हैं। इस प्रकार भृगु और केवल भृगु एवं अंगिरा और केवल अंगिरा इस तरह के उनके दो-दो विभाग हो गए हैं। भृगु के 7 गणों में वत्स, विद और आर्ष्टिषेण ये तीन तो जमदग्नि के भीतर आ गए। शेष यस्क, मिवयुव, वैन्य और शुनक ये केवल भार्गव कहाते हैं। इसी प्रकार अंगिरा के गौतम, भारद्वाज और केवल आंगिरस ये तीन गण हैं। उनमें दो तो आठ के भीतर ही है। गौतम के 10 गण हैं, अयास्य, शरद्वन्त, कौमण्ड, दीर्घतमस, औशनस, करेणुपाल, रहूगण, सोमराजक, वामदेव, बृहदुक्थ। इसी प्रकार भारद्वाज के चार हैं, भारद्वाज, गर्ग, रौक्षायण, कपि। केवलांगिरस के पाँच हैं, हरित, कण्व, रथीतर, मुद्गल, विष्णुबृद्ध। इस तरह सिर्फ भृगु और अंगिरा के ही 23 गण हो गए। इससे स्पष्ट है कि भरद्वाज या भारद्वाज गोत्र का गर्ग या गार्ग्य के साथ विवाह नहीं हो सकता। क्योंकि उनका गण एक ही है। अत्रि के चार गण हैं, पूर्वात्रोय, वाद्भुतक, गविष्ठिर, मुद्गल। विश्‍वामित्र के दस हैं - कुशिक, रोहित, रौक्ष, कामकायन, अज्ञ, अघमर्षण, पूरण, इंद्रकौशिक, धनंजय, कत। धनंजय और कौशिक का परस्पर विवाह नहीं हो सकता। कश्यप के पाँच हैं - कश्यप, निध्रुव, रेभ, शांडिल्य, लौगाक्षि। शांडिल्य, कश्यप, लौगाक्षि का परस्पर विवाह असंभव है। वसिष्ठ के पाँच हैं - वसिष्ठ, कुंडिन, उपमन्यु, पराशर और जातूकर्ण्य। वसिष्ठ और पराशर आदि का परस्पर विवाह ठीक नहीं है। अगस्त्य का कोई अन्तर्गण नहीं है। इस प्रकार कुल 51 गण हैं। किसी-किसी के मत से कुछ कम या अधिक भी है। कोई-कोई गौत्र द्वयामुष्यायण कहलाते हैं, जैसे सांकृति या साकृत्य और लौगाक्षि आदि। इसका अर्थ यह है कि इन ऋषियों का सम्बन्ध दो गोत्रों से हैं। ये ऋषि किसी कारण से दोनों गोत्रों से सम्बन्ध रखते हैं, न कि एक छोड़ कर दूसरे से मिल गए। इसीलिए सांकृति का वसिष्ठ के साथ और लौगाक्षि का भी वसिष्ठ के साथ, एवं लौगाक्षि का और सांकृति का भी परस्पर विवाह नहीं होगा। क्योंकि लौगाक्षि और सांकृति दोनों वसिष्ठ गोत्र में गए और साथ ही, सांकृति का केवलांगिरस के गण में और लौगाक्षि का कश्यप के गण में जन्म हैं। भरद्वाज, भारद्वाज, कश्यप, काश्यप, गर्ग, गार्ग्य, भृगु, भार्गव ये अलग-अलग गोत्र हैं, न कि कश्यप और काश्यप आदि एक ही है। परंतु विवाह तो फिर भी कश्यप काश्यप आदि का परस्पर नहीं हो सकता। कारण, मूल ऋषि एक ही हैं। इसी प्रकार यद्यपि भृगु के वंश में ही वत्स हुए, तथापि वत्सगोत्र अलग ही है। विश्‍वामित्र के प्रकरण में इंद्र कौशिक गोत्र है जो कौशिक से भिन्न ही है। इसी प्रकार धृत गोत्र भी उसी में हैं। मगर कहीं-कहीं सर्यूपारियों में धृत कौशिक को एक ही गोत्र मान कर व्यवहार करते हैं। यह भूल है। इसी प्रकार गर्दभीमुख नाम के एक ऋषि कश्यप के गण में हैं और शांडिल्य भी। पर इसका अर्थ न समझ लोगों ने गर्दभी मुख का कल्पित अर्थ कर डाला है और श्रीमुख नाम का एक दूसरा गोत्र भी मान रखा है। उनके विचार से शांडिल्य गोत्र के ही ये दो भेद हैं। मगर बात यह नहीं है। यह तो परस्पसर नीच-ऊँच के भावों का फल है। श्रीमुख कोई गोत्रकार ऋषि नहीं हैं। हाँ गर्दभीमुख है। पर शांडिल्य से भिन्न है। फिर भी, कश्यप के अन्तर्गत होने से दोनों का परस्पर विवाह नहीं हो सकता। कोई-कोई इंद्र और कौशिक ये दो गोत्र मानते हैं और धृत को घृत पढ़ते हैं। पाठ-भेद हो सकता है। पर, हरिवंश के सातवें अध्याय में धृत ही मिलता है और उनको धर्मभृत भी कहा है। इससे धृत पाठ ही अधिक माननीय है। गोत्रों के प्रवर के सिवाय वेद, शाखा, सूत्र पाद, सिखा और देवता का भी विचार है। ऐसा संप्रदाय अभी तक बराबर चला आता है। इनमें से वेद का अभिप्राय यह है कि उस गोत्र का ऋषि ने उसी वेद के पठन-पाठन या प्रचार में विशेष ध्यान दिया और उस गोत्रवाले प्रधानतया उसी वेद का अध्ययन और उसमें कहे गए कर्मों का अनुष्ठान करते आए। इसीलिए किसी का गोत्र यजुर्वेद है तो किसी का सामवेद और किसी का ऋग्वेद है, तो किसी का अथर्ववेद। उत्तर के देशों में प्राय: साम और यजुर्वेद का ही प्रचार था। किसी-किसी का ही अथर्ववेद मिलता है। अब आगे चल कर लोग संपूर्णतया एक वेद भी पढ़ न सके, किंतु उसकी अनेक शाखाओं में से सिर्फ एक ही, तो फिर उन गोत्रों के लोगों ने शाखा का व्यवहार करना शुरू किया। सूत्रों का तो सिर्फ यही अर्थ हैं कि उन वेदों की उन-उन शाखाओं में कहे गए कर्मों की विधि और उनके अंगों के क्रम आदि के विचार के लिए ऋषियों ने जिन-जिन श्रौत या गृह्य सूत्रों का निर्माण किया है, उन्हीं के अनुसार विभिन्न गोत्रों की पद्धतियाँ तैयार की गई है और उन्हीं के अनुसार कर्म-कलाप होते हैं। हरेक वेदों के ये सूत्र विभिन्न ऋषियों द्वारा बनाए गए हैं। जैसे यजुर्वेद का कात्यायन ने बनाया है, सामवेद का गोभिल ने, ऋग्वेद का आश्‍वलायन ने और अथर्ववेद का कौशिक ने। और भी ऋषि हैं जिनके सूत्र वेदों की शाखाओं पर हैं। हरेक ऋषि ने अपनी ही शाखा का सूत्र ग्रन्थ बनाया है। हरेक वेद या उसकी शाखा के पढ़नेवाले किसी विशेष देवता की आराधना करते थे। वही उनके देवता कहे गए। इसी तरह तुरंत पहचान के लिए उनके बाहरी व्यवहार में भी कुछ अन्तर रखा जाता था। जैसे कोई शिखा में जो ग्रंथि देता वह बाईं तरफ घुमा कर और कोई दाहिनी तरफ। इसी प्रकार पूजा के समय प्रथम कोई बायाँ पाँव धोता या धुलाता था और कोई दाहिना। बस वही व्यवहार अब तक कहने मात्र को रह गया है और वही पाद कहलाता है। प्राय: यही नियम था कि सामवेदियों की बाईं शिखा और बायाँ ही पाद और विष्णु देवता हों। इसी प्रकार यजुर्वेदियों की दाहिनी शिखा, दाहिना पाद और शिव देवता। कहीं-कहीं शिखा और पाद में शायद उलट-पलट है। परंतु वह हमारे जानते काल पा कर भूल से बदल गया होगा। क्योंकि जब और बातों में नियम हैं तो यहाँ भी एक ही नियम लागू होना चाहिए। इसी तरह सामवेदियों की कौथुमी शाखा और गोभिल सूत्र एवं यजुर्वेदियों की माध्यंदिनीय शाखा और कात्यायन सूत्र हैं। चारों वेदों के चार उपवेद भी है और उनका भी व्यवहार पाया जाता है। यजुर्वेद का धानुर्वेद, ऋग्वेद का आयुर्वेद, सामवेद का गांधर्व वेद और अथर्ववेद का अर्थवेद वा अर्थशास्त्र है। किस गोत्र का कौन वेद हैं, इसमें इस समय बड़ी गड़बड़ी है, कारण व्यवहार और संप्रदाय हर प्रदेश में कुछ न कुछ बदल गए हैं। कान्यकुब्जों और सर्यूपारियों में पाँच गोत्रों का और कहीं-कहीं छह का सामवेद बताया है। वे पाँच कश्यप, काश्यप, वत्स, शांडिल्य और धनंजय हैं और छठां कौशिक हैं। परंतु इसके विपरीत मैथिलों में सिर्फ एक शांडिल्य का ही सामवेद लिखा है शेष गोत्रों का यजुर्वेद ही। हालाँकि उनकी एक वंशावली में, जो पिलखबाड़ ग्राम के पंजीकार श्री जयनाथ शर्मा की लिखी है, लिखा है कि : कश्यपौ वत्सशांडिल्यौ कौशिकश्‍च धनंजय:। षडेते सामगा विप्रा: शेषा वाजसनेयनि:॥ इससे पूर्व के छह गोत्र सामवेदी सिद्ध होते हैं। कान्यकुब्ज वंशावली में लिखते हैं कि पाँच ही सामवेदी हैं, कौशिक नहीं : कश्यप: काश्यपो वत्स: शांडिल्यश्‍च धनंजय:। पंचैते साम गायन्ति यजुरधयायिनोऽपरे॥ यह बात असंभव-सी भी मालूम होती है कि सिर्फ शांडिल्य ने ही सामवेद का प्रचार किया और दूसरे किसी भी ऋषि ने नहीं। इससे पाँच या छह गोत्रों का ही सामवेद मानना ठीक हैं। इसलिए त्यागी, पश्‍चिम, जमींदार या भूमिहार आदि अयाचक ब्राह्मणों में भी इसी के अनुसार संस्कार आदि और प्रचार होना चाहिए। गौड़, जिझौतिया वगैरह में भी इसी का प्रचार है। आजकल एक गोत्र पाया जाता है जिसका उल्लेख पुराने ग्रन्थों में कहीं नहीं मिलता। वह है कविस्त, काविस्त अथवा कावित्स। अत्रि के एक गण के ऋषि का नाम गविष्ठिर है। संभव है इसी का विपर्याय हो गया हो। लेकिन प्रवर में भेद है। प्रवरों के विषय में बड़ा मतभेद और वाद-विवाद है। एक प्रवर तो सिर्फ चार प्रचलित गोत्रों में है। वसिष्ठ का वासिष्ठ शुनक का शौनक, मित्रायुव का बाधय्रश्‍व और अगस्त्य का आगस्त्य। कश्यप का ही सिर्फ दो प्रवर है, देवल और असित। मगर इनके भी तीन प्रवर लिखे हैं। इसी प्रकार पाँच प्रवर गर्ग, सावर्णि, वत्स, भार्गव, भरद्वाज, भारद्वाज, जमदग्नि और गौतम के हैं। मगर तीन प्रवर भी इनके लिखे हैं। हरेक गोत्रों के प्रवरों की जितनी संख्या हो उतनी ग्रंथि जनेऊ में दी जाती है। कुछ प्रसिद्ध गोत्रों के प्रवर आदि नीचे लिखे हैं : (1) कश्यप, (2) काश्यप के काश्यप, असित, देवल अथवा काश्यप, आवत्सार, नैधु्रव तीन प्रवर हैं। इस गोत्र के ब्राह्मण ये हैं - जैथरिया, किनवार, बरुवार, दन्सवार, मनेरिया, कुढ़नियाँ, नोनहुलिया, तटिहा, कोलहा, करेमुवा, भदैनी चौधरी, त्रिफला पांडे, परहापै, सहस्रामै, दीक्षित, जुझौतिया, बवनडीहा, मौवार, दघिअरे, मररें, सिरियार, धौलानी, डुमरैत, भूपाली आदि। (3) पराशर के वसिष्ठ, शक्‍ति, पराशर तीन प्रवर हैं। इस गोत्र के ब्राह्मण एकसरिया, सहदौलिया, सुरगणे हस्तगामे आदि है। (4) वसिष्ठ के वसिष्ठ, शक्‍ति, पराशर अथवा वसिष्ठ, भरद्वसु, इंद्र प्रमद ये तीन प्रवर हैं। ये ब्राह्मण कस्तुवार, डरवलिया, मार्जनी मिश्र आदि हैं। कोई वसिष्ठ, अत्रि, संस्कृति प्रवर मानते हैं। (5) शांडिल्य के शांडिल्य, असित, देवल तीन प्रवर हैं। दिघवैत, कुसुमी-तिवारी, नैनजोरा, रमैयापांडे, कोदरिए, अनरिए, कोराँचे, चिकसौरिया, करमहे, ब्रह्मपुरिए, पहितीपुर पांडे, बटाने, सिहोगिया आदि इस गोत्र के ब्राह्मण हैं। (6) भरद्वाज, (7) भारद्वाज के आंगिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज अथवा आंगिरस, गार्ग्य, शैन्य तीन प्रवर हैं। दुमटिकार, जठरवार, हीरापुरी पांडे, बेलौंचे, अमवरिया, चकवार, सोनपखरिया, मचैयांपांडे, मनछिया आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं। (8) गर्ग। (9) गार्ग्य के आंगिरस, गार्ग्य, शैन्य तीन अथवा धृत, कौशिक मांडव्य, अथर्व, वैशंपायन पाँच प्रवर हैं। मामखोर के शुक्ल, बसमैत, नगवाशुक्ल, गर्ग आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं। (10) सावर्ण्य के भार्गव, च्यवन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य पाँच, या सावर्ण्य, पुलस्त्य, पुलह तीन प्रवर हैं। पनचोभे, सवर्णियाँ, टिकरा पांडे, अरापै बेमुवार आदि इस गोत्र के हैं। (11) वत्स के भार्गव, च्यवन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य पाँच, या भार्गव, च्यवन, आप्नवान तीन प्रवर हैं। दोनवार, गानामिश्र, सोनभदरिया, बगौछिया, जलैवार, शमसेरिया, हथौरिया, गगटिकैत आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं। (12) गौतम के आंगिरस बार्हिस्पत्य, भारद्वाज या अंगिरा, वसिष्ठ, गार्हपत्य, तीन, या अंगिरा, उतथ्य, गौतम, उशिज, कक्षीवान पाँच प्रवर हैं। पिपरामिश्र, गौतमिया, करमाई, सुरौरे, बड़रमियाँ दात्यायन, वात्स्यायन आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं। (13) भार्गव के भार्गव, च्यवन, आप्नवान, तीन या भार्गव, च्यवन आप्नवन, और्व, जायदग्न्य, पाँच प्रवर हैं, भृगुवंश, असरिया, कोठहा आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं। (14) सांकृति के सांकृति, सांख्यायन, किल, या शक्‍ति, गौरुवीत, संस्कृति या आंगिरस, गौरुवीत, संस्कृति तीन प्रवर हैं। सकरवार, मलैयांपांडे फतूहाबादी मिश्र आदि इन गोत्र के ब्राह्मण हैं। (15) कौशिक के कौशिक, अत्रि, जमदग्नि, या विश्‍वामित्रा, अघमर्षण, कौशिक तीन प्रवर हैं। कुसौझिया, टेकार के पांडे, नेकतीवार आदि इस गोत्र के ब्राह्मण हैं। (16) कात्यायन के कात्यायन, विश्‍वामित्र, किल या कात्यायन, विष्णु, अंगिरा तीन प्रवर हैं। वदर्का मिश्र, लमगोड़िया तिवारी, श्रीकांतपुर के पांडे आदि इस गोत्र के ब्राह्मण हैं। (17) विष्णुवृद्ध के अंगिरा, त्रासदस्यु, पुरुकुत्स तीन प्रवर हैं। इस गोत्र के कुथवैत आदि ब्राह्मण हैं। (18) आत्रेय। (19) कृष्णात्रेय के आत्रेय, आर्चनानस, श्यावाश्‍व तीन प्रवर हैं। मैरियापांडे, पूले, इनरवार इस गोत्र के ब्राह्मण हैं। (20) कौंडिन्य के आस्तीक, कौशिक, कौंडिन्य या मैत्रावरुण वासिष्ठ, कौंडिन्य तीन प्रवर हैं। इनका अथर्ववेद भी है। अथर्व विजलपुरिया आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं। (21) मौनस के मौनस, भार्गव, वीतहव्य (वेधास) तीन प्रवर हैं। (22) कपिल के अंगिरा, भारद्वाज, कपिल तीन प्रवर हैं। इस गोत्र के ब्राह्मण जसरायन आदि हैं। (23) तांडय गोत्र के तांडय, अंगिरा, मौद्गलय तीन प्रवर हैं। (24) लौगाक्षि के लौगाक्षि, बृहस्पति, गौतम तीन प्रवर हैं। (25) मौद्गल्य के मौद्गल्य, अंगिरा, बृहस्पति तीन प्रवर हैं। (26) कण्व के आंगिरस, आजमीढ़, काण्व, या आंगिरस, घौर, काण्व तीन प्रवर हैं। (27) धनंजय के विश्‍वामित्र, मधुच्छन्दस, धनंजय तीन प्रवर हैं। (28) उपमन्यु के वसिष्ठ, इंद्रप्रमद, अभरद्वसु तीन प्रवर हैं। (29) कौत्स के आंगिरस, मान्धाता, कौत्स तीन प्रवर हैं। (30) अगस्त्य के अगस्त्य, दाढर्यच्युत, इधमवाह तीन प्रवर हैं। अथवा केवल अगस्त्यही। इसके सिवाय और गोत्रों के प्रवर प्रवरदर्पण आदि से अथवा ब्राह्मणों की वंशावलियों से जाने जा सकते हैं। Nadouli nath gharana पर 12:01 am साझा करें  कोई टिप्पणी नहीं: एक टिप्पणी भेजें › मुख्यपृष्ठ वेब वर्शन देखें मेरे बारे में  Nadouli nath gharana  मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें Blogger द्वारा संचालित. 

शांडिल्य गोत्र सरयूपारीण ब्रह्मण

शांडिल्य गोत्र सरयूपारीण ब्रह्मण | Shandilya Gotra Saryuparin Brahman सोमवार, 16 मार्च 2015 शांडिल्य गोत्र सरयूपारीण ब्रह्मण | Shandilya Gotra Saryuparin Brahman शांडिल्य, की परिभाषा शांडिल्य, का अर्थ शांडिल्य - शांडिल्यसंज्ञा पुं० [सं० शाणिडल्य] १. बेल । श्रीफल । २. अग्नि । ३. एक मुनि जिनकी रची एक स्मृति है और जो भक्तिसूत्र के कर्ता माने जाते हैं । ४. शांडिल्य के कुल में उत्पन्न पुरूष । ५. सरयूपारीण ब्राह्मणों के तीन प्रधान गोत्रों में से एक गोत्र । यौ०—शांडिल्य गोत्र = शांडिल्य के कुल में उत्पन्न । शांडिल्य गोत्र की व्युत्पत्ति व्रह्मा : - कश्यप,असिती,देवल. वेद :- सामवेद प्रवर :- कश्यप,असिती,देवल शाखा :- कौथुमी उपवेद:- गन्धर्व शिखा:- वाम पाद :- वाम सूत्र :- गोमिल इष्ट देव :- शिव वंशज :- सरया,सोहगौरा,मठिया,देउरवा,बलुआ,सिरजम,धानी,सोपारी,चेतिया,परतावल. उप नाम: - राम,कृष्ण,नाथ,मणि. राम घराना:- गोरखनाथ नामक एक तपस्वी एवं ओजस्वी ब्राह्मण थे उन्ही के नाम पर राम घराना नाम पड़ा. सरया,सोहगौरा,उनवलिया,अतरौलिया,रुद्रपुर,झुडिया,वहुआरी,मसरुतिया,कोठा,वदश,मऊ,गोहना,दुलई,मलहानी. कृष्ण घराना:- बारिपुर, बसावनपुर, बंजरिया ,बुधियाबारी. नाथ घराना:- नदौली , चेतिया,परतावल,मिलौनी,निगहिया. मणि घराना:- देवता, पचरुखिया, धानी, हरदी,बलुआ,बुधियाबारी,तलियाबाद,बढ़ना,सिरजम,सेमरी,रथवर्ग,देवतिया,बरपार,उद्धवपुर,हथिदह,परास्सुपारी,यमुना,करकपर्गढ़,सुकरौली,सोनौरा ,कुठौली,सिसवांलेदक | Nadouli nath gharana पर 10:10 pm साझा करें  कोई टिप्पणी नहीं: एक टिप्पणी भेजें ‹ मुख्यपृष्ठ वेब वर्शन देखें मेरे बारे में  Nadouli nath gharana  मेरा पूरा प्रोफ़ाइल देखें Blogger द्वारा संचालित. 

सरयूपारीण ब्राह्मण

 Wiki Loves Earth photo contest: Upload photos of natural heritage sites in India to help Wikipedia and win fantastic prizes! मुख्य मेनू खोलें  खोजें संपादित करेंइस पृष्ठ का ध्यान रखेंकिसी अन्य भाषा में पढ़ें सरयूपारीण ब्राह्मण पेज समस्याएं सरयूपारीण ब्राह्मण या सरवरिया ब्राह्मण या सरयूपारी ब्राह्मण सरयू नदी के पूर्वी तरफ बसे हुए ब्राह्मणों को कहा जाता है। ऋग्वेद मे सिर्फ़ तीन नदियो का उल्लेख ही है। इनमे सरस्वती, सिंधु और सरयू नदी का ज़िक्र है। कई लोगो का मानना है कि सरयूपारीण ब्राह्मण उन्ही मूल कान्य्कुब्ज ब्राह्मणों का दल है जिन्होने भारतीय सभ्यता की नीव पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तरी बिहार मे रखी। ये शुद्ध आर्यवंशी षट्कर्मा वेदपाठी आदिकालिक समूह है जो की आदिकाल से ही ब्राह्मण धर्म का अधिष्ठाता रहा है। सरयूपारीण ब्राह्मण उत्पत्ति संपादित करें भ्रांतियाँ संपादित करें सरयूपारीण ब्राह्मण की उत्पत्ति एवं इसकी वंशावली को लेकर आठ पंडितो ने किताबे लिखी हैं परन्तु सभी ने जो तर्क दिए, उनमें विरोधाभाष दिखता हैं। उदाहरण के लिए सन १९१४ में प्रयाग के पंडित भोलाराम अग्निहोत्री ने अपने किताब "सरयूपारीण ब्राह्मण द्वीजोत्पत्तिः" में सरयूपारीण ब्राह्मण की उत्पत्ति को लेकर कथा लिखी हैं उसके अनुसार- जब श्री रामचन्द्र जी के अश्वमेध यज्ञ हेतु कान्यकुब्ज प्रदेश से १६ ब्राम्हणों को बुलाया गया, यज्ञ के संपन्न होने के बाद वे जब अपने प्रदेश वापस जाने लगे तो श्रीराम ने उनसे वही बस जाने की विनती की और अपने धनुष से एक बाण चलाया जो २५ योजन दूर सरयू और घाघरा नदी संगम में जा गिरा और इस पच्चीस योजन की भूमि उन्होंने ब्राम्हणों की दान में दे दी। शर (बाण) और वार (निशाना) किये जाने के कारण इस भूमि क्षेत्र को शरवार या सरवार कहा जाने लगा और वहाँ के रहने वाले ब्राम्हण सरवरिया कहलाने लगे। अब इस कहानी पर गौर करे तो यह वाल्मीकि रामायण में वर्णित हैं की गोमती नदी के किनारे यह यज्ञ संपन्न हुआ था। जिसमे वशिष्ठ, वामदेव और जाबालि आदि ऋषियों ने भाग लिया था। परन्तु सरयूपारीण ब्राम्हणों में वामदेव और जाबालि के ब्राम्हण नहीं मिलते। अत: इसे भ्रमपूर्ण ही माना जायेगा की सरयूपारीण ब्राम्हणों के पूर्वज इस यज्ञ में सम्मलित थे। इसके अलावा इसमें जो वार (निशाना) शब्द का उपयोग किया गया हैं, उसका किसी भी संस्कृत ग्रंथो में उल्लेख नहीं हैं। अंग्रेज इतिहासकार सर एस एलियट के अपने एक लेख के अनुसार कन्नौज के रहने वाले कान्यकुब्ज की ही पांच शाखाओ में से एक सरयू के आस पास फैल गए। इसके अलावा अन्य अंग्रेज लेखकों सर जॉन वोम्स, डब्लू क्रूक के अनुसार कान्य और कुब्जा दो भाई थे जिनकी संताने ही आगे जाकर कान्यकुब्ज कहलाई। और इन्ही की एक शाखा राजा अज के समय सरयू नदी किनारे आ कर बस गए और सरवरिया ब्रम्हाण कहलाने लगे। इस कहानी में भी कई मतभेद देखे जा सकते हैं। जैसे की वायु पुराण के भुवन विन्यास प्रसंग में ब्रम्हाजी के जन्म से लेकर ब्राम्हण तक के जन्म तक की कथा हैं। परन्तु राजा अज के समय में ब्राम्हणो के वहाँ आकर बसने या उनका शाखाओ में विरक्त होने का कोई सन्दर्भ नहीं हैं। उत्पत्ति संपादित करें पुराणों से पता चलता हैं की देवगण हिमालय पर्वत (पामीर का पठार) के आस-पास रहा करते थे तथा उसी के निकट ही महानतम ऋषियों के आश्रम हुआ करते थे। चुकि पुराणों में हिमालय पर्वत श्रंखला को बहुत ही पवित्र माना गया हैं अतः ऋषियों का वहाँ रहना सम्भव लगता हैं। यदि पौराणिक संदर्भो की ओर देख जाए तो जब देवराज इंद्र की आतिथ्य स्वीकार कर अपने राजधानी को लौटते हुए राजा दुष्यंत ने ऋषियों के परम क्षेत्र हेमकूट पर्वत की ओर देखा था जिसका वर्णन पद्म पुराण में आया हैं : दक्षिणे भारतं वर्ष उत्तरे लवणोदधेः । कुलादेव महाभाग तस्य सीमा हिमालयः ।। ततः किंपुरषं हेमकुटादध: स्थितम । हरि वर्ष ततो ज्ञेयं निवधोबधिरुच्यते ।। इसी प्रकार बाराह पुराण के एक प्रसंग में महर्षि पुलस्त्य, धर्मराज युधिष्ठिर से यात्रा के सन्दर्भ में बताते हैं की: ततो गच्छेत राजेंद्र देविकं लोक विश्रुताम । प्रसूतिर्यत्र विप्राणां श्रूयते भारतषर्भ ।। देविकायास्तटे वीरनगरं नाम वैपुरम । समृदध्यातिरम्यान्च पुल्सत्येन निवेशितम ।। अर्थात- हे राजेन्द्र लोक विश्रुत देविका नदी को जाना चाहिए जहा ब्राम्हणों कि उत्पत्ति सुनी जाती है। देविका नदी के तट पर वीरनगर नामक सुन्दर पुरी है जो समृद्ध और सुन्दर हैं। एक अन्य पुराण के सन्दर्भ से निश्चित होता हैं की देविका नदी के किनारे हेमकूट नामक किम्पुरुष क्षेत्र में ऋषि-मुनि रहा करते थे। "देविकायां सरय्वाचं भवेदाविकसरवौ" अर्थात- देविका और सरयू क्षेत्र के रहने वाले आविक और सारव कहे जाते हैं। अनुमान हैं, की सारव और अवार (तट) के संयोग से सारववार बना होगा, और फिर समय के साथ उच्चारण में सरवार बन गया होगा। इसी सरवार क्षेत्र के रहने वाले सरवरिया कहे जाने लगे होंगे। इस सम्बन्ध में मत्स्य पुराण में निम्न सन्दर्भ मिलता हैं: अयोध्यायां दक्षिणे यस्याः सरयूतटाः पुनः । सारवावार देशोयं तथा गौड़ः प्रकीर्तितः ।। अर्थात- अयोध्या के दक्षिण में सरयू नदी के तट पर सरवावार देश हैं उसी प्रकार गोंडा देश भी मानना चाहिए। सरयू नदी कैलाश पर्वत से निकल कर विहार प्रदेश में छपरा नगर के समीप नारायणी नदी में मिल जाती हैं। देविका नदी गोरखपुर से ६० मील दूर हिमालय से निकल कर ब्रम्हपुत्र के साथ गण्डकी में मिलती हैं। गण्डकी नदी नेपाल की तराई से निकल कर सरवार क्षेत्र होता हुआ सरयू नदी में समाहित होता हैं। सरयू, घाघरा, देविका (देवहा) ये तीनो नदियाँ एक ही में मिल कर कही-कही प्रवाहित होती हैं। महाभारत में इसका उल्लेख हैं की सरयू, घाघरा और देविका नदी हिमालय से निकलती हैं, तीनो नदियों का संगम पहाड़ में ही हो गया था। इसीलिए सरयू को कही घाघरा तो कही देविका कहा जाता हैं। पुराणों के अनुसार यही ब्रम्ह क्षेत्र हैं, जहाँ पर ब्राम्हणों की उत्पत्ति हुई थी यथासमय ब्रम्ह देश से जो ब्राम्हण अन्य देश में गए, वे उस देश के नाम से अभिहित हुए। जो विंध्य के दक्षिण क्षेत्र में गए वे महाराष्ट्रीय, द्रविड़, कर्नाटक और गुर्जर ब्राम्हण के रूप में प्रतिष्ठित हुए। और जो विंध्य के उत्तर देशो में बसे, वे सारस्वत, कान्यकुब्ज, गोंड़, उत्कल, मैथिल ब्राम्हण के रुप में प्रतिष्ठित हुए। इस तरह दशविध ब्राम्हणों के प्रतिष्ठित हो जाने पर ब्रम्हदेश के निवासी ब्राम्हणों की पहचान के लिए उनकी सर्वार्य संज्ञा हो गई। वही आगे चल कर सर्वार्य, सरवरिया, सरयूपारीण आदि कहे जाने लगे। अतः जो लोग सरयूपारीण ब्राम्हणों को कान्यकुब्ज की ही एक शाखा कहते हैं, यह एक भ्रांति मात्र हैं। स्मृतियों में पंक्ति पावन ब्राम्हणों का उल्लेख मिलता हैं। पंक्ति पावन ब्राम्हण सर्यूपारिणो में ही होते हैं। जो आज भी पंतिहा या पंक्तिपावन के रूप में विद्द्मान हैं। सरयूपारीण ब्राम्हणों कि वंशावली गौत्र के अनुसार जानकारी संपादित करें गर्ग गौत्र संपादित करें गौत्र - गर्ग वेद - यजुर्वेद उपवेद - धनुर्वेद शिखा - दाहिन पाद - दाहिन शाखा - माध्यन्दिनी सूत्र - कात्यायन देवता - शिव प्रवर - पञ्च (पांच) गर्ग गौत्र मे मुख्यत: तीन वंश पाये जाते है। १ शुक्ल २ तिवारी ३ भारद्वाज शुक्ल वंश संपादित करें गर्ग गौत्र मे मुख्यत: शुक्ल वंश होता है। शुक्ल वंश का आदि स्थान भेड़ी को माना जाता है स्थानों के आधार पर इन्हैं आगे दो श्रेणियों में रखा गया हैं जिनकी पंक्ति सुरक्षित हैं- - ममखोर - वाकरुआ - महसो - लखनौर जिनकी पंक्ति नही हैं- - करंजही - कनईल - मझगवां - वहेरी - बहरुचिया आगे चलकर स्थान भेद से निम्न शुक्ल वंश प्रसिध्द हुए :- १ ममखोर जिनकी पंक्ति है:- १- मामखोर, २- खखाइज खोर, ३- भेड़ी, ४- वाकरुआ, ५-रुदाइन जिनकी पंक्ति टूट गई है:- १- बरहुचिया, २- सीपर, ३- सरांव, ४- छोटका सरांव, ५- कनइल, ६- भंटोली, ७- बहेरी तलहा २ महसों जिनकी पंक्ति है:- १- कटारी, २- झौवा, ३- रुद्रपुर, ४- मेहरा, ५- सिलहटा जिनकी पंक्ति टूट गई है:- १- मुंडेरा, २- बकैना, ३- बसौढ़ी, ४- खोरी पकरि, ५- गोपालपुर, ६- अकौलिया ३ लखनौर जिनकी पंक्ति है:- १- भेलरवा जिनकी पंक्ति टूट गई है:- १- तुरकहिया, २- कसैला, ३- हटवा, ४- आमचौर, ५- वाईखोर, ६- लोहलौरी, ७- जिगिना, ८- जिगनी, ९- सिटकिहा, १०- झरकटिया, ११- चिनगहिया, १२- भादी, १३- छोटकी भादी, १४- हथरसा, १५- नवागांव, १६- पैड़ी, १७- गौबरहिया Last edited 1 day ago by Nilesh shukla RELATED PAGES सरयू शांडिल्य जायसवाल ब्राह्मण  सामग्री CC BY-SA 3.0 के अधीन है जब तक अलग से उल्लेख ना किया गया हो। गोपनीयताडेस्कटॉप