Friday, 31 March 2017
हनुमान साधना

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शुक्रवार, 13 अगस्त 2010
हनुमान साधना के नियम
हनुमान जी को प्रसन्न करना बहुत सरल है। राह चलते उनका नाम स्मरण करने मात्र से ही सारे संकट दूर हो जाते हैं। जो साधक विधिपूर्वक साधना से हनुमान जी की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं उनके लिए प्रस्तुत हैं कुछ उपयोगी नियम ...
वर्तमान युग में हनुमान साधना तुरंत फल देती है। इसी कारण ये जन-जन के देव माने जाते हैं। इनकी पूजा-अर्चना अति सरल है, इनके मंदिर जगह-जगह स्थित हैं अतः भक्तों को पहुंचने में कठिनाई भी नहीं आती है। मानव जीवन का सबसे बड़ा दुख भय'' है और जो साधक श्री हनुमान जी का नाम स्मरण कर लेता है वह भय से मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
हनुमान साधना के कुछ नियम यहां उद्धृत हैं। जिनका पालन करना अति आवश्यक है :
हनुमान साधना में शुद्धता एवं पवित्रता अनिवार्य है। प्रसाद शुद्ध घी का बना होना चाहिए।
हनुमान जी को तिल के तेल में मिल हुए सिंदूर का लेपन करना चाहिए।
हनुमान जी को केसर के साथ घिसा लाल चंदन लगाना चाहिए।
पुष्पों में लाल, पीले बड़े फूल अर्पित करने चाहिए। कमल, गेंदे, सूर्यमुखी के फूल अर्पित करने पर हनुमान जी प्रसन्न होते हैं।
नैवेद्य में प्रातः पूजन में गुड़, नारियल का गोला और लडू, दोपहर में गुड़, घी और गेहूं की रोटी का चूरमा अथवा मोटा रोट अर्पित करना चाहिए। रात्रि में आम, अमरूद, केला आदि फलों का प्रसाद अर्पित करें।
साधना काल में ब्रह्मचर्य का पालन अति अनिवार्य है।
जो नैवेद्य हनुमान जी को अर्पित किया जाता है उसे साधक को ग्रहण करना चाहिए।
मंत्र जप बोलकर किए जा सकते हैं। हनुमान जी की मूर्ति के समक्ष उनके नेत्रों की ओर देखते हुए मंत्रों के जप करें।
साधना में दो प्रकार की मालाओं का प्रयोग किया जाता है। सात्विक कार्य से संबंधित साधना में रुद्राक्ष माला तथा तामसी एवं पराक्रमी कार्यों के लिए मूंगे की माला।
साधना पूर्ण आस्था, श्रद्धा और सेवा भाव से की जानी चाहिए।
मंगलवार हनुमान जी का दिन है। इस दिन अनुष्ठान संपन्न करना चाहिए। इसके अतिरिक्त शनिवार को भी हनुमान पूजा का विधान है।
हनुमान साधना से ग्रहों का अशुभत्व पूर्ण रूप से शांत हो जाता है। हनुमान जी और सूर्यदेव एक दूसरे के स्वरूप हैं, इनकी परस्पर मैत्री अति प्रबल मानी गई है। इसलिए हनुमान साधना करने वाले साधकों में सूर्य तत्व अर्थात आत्मविश्वास, ओज, तेजस्विता आदि विशेष रूप से आ जाते हैं। यह तेज ही साधकों को सामान्य व्यक्तियों से अलग करता है।
हनुमान जी की साधना में जो ध्यान किया जाता है उसका विशेष महत्व है। हनुमान जी के जिस विग्रह स्वरूप का ध्यान करें वैसी ही मूर्ति अपने मानस में स्थिर करें और इस तरह का अभ्यास करें कि नेत्र बंद कर लेने पर भी वही स्वरूप नजर आता रहे।
श्री हनुमान ध्यान
उद्यन्मार्तण्ड कोटि प्रकटरूचियुतं चारूवीरासनस्थं।
मौंजीयज्ञोपवीतारूण रूचिर शिखा शोभितं कुंडलांकम्
भक्तानामिष्टदं तं प्रणतमुनिजनं वेदनाद प्रमोदं।
ध्यायेद्नित्यं विधेयं प्लवगकुलपति गोष्पदी भूतवारिम॥
उदय होते हुए करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी, मनोरम, वीर आसन में स्थित मुंज की मेखला और यज्ञोपवीत धारण किए हुए कुंडली से शोभित मुनियों द्वारा वंदित, वेद नाद से प्रहर्षित वानरकुल स्वामी, समुद्र को एक पैर में लांघने वाले देवता स्वरूप, भक्तों को अभीष्ट फल देने वाले श्री हनुमान मेरी रक्षा करें।
हनुमान साधना में अलग कार्यों की पूर्ति हेतु अलग-अलग मंत्र सामग्रियों एवं जप अनुष्ठानों का विधान है। हनुमान साधना में षोडशोपचार पूजा का विधान भी है। इस पूजा में कुएं का शुद्ध जल, दूध, दही, घी मधु और चीनी का पंचामृत, तिल के तेल में मिला सिंदूर, रक्त चंदन, लाल पुष्प, जनेउ, सुपारी, गुड़, नारियल का गोला, पांच बत्तियों का दीपक और अष्टगंध आवश्यक हैं।
हनुमान साधना में हनुमान का चित्र और अनुष्ठान से संबंधित यंत्र के अतिरिक्त केवल राम सीता का चित्र अथवा मूर्ति रख सकते हैं। इसके अतिरिक्त अन्य कोई चित्र या मूर्ति रखना वर्जित है।
हनुमान साधना के दिन प्रातः साधक स्नान कर शुद्ध लाल वस्त्र धारण कर उत्तर दिशा की ओर मुंह कर बैठें तथा अपने सामने हनुमान जी की मूर्ति या चित्र दक्षिणाभिमुख रखें। साधक को संकल्प लेकर अनुष्ठान प्रारंभ करना चाहिए।
हनुमन्मंत्र चमत्कारानुष्ठान :
हनुमान साधना से संबंधित अनेक मंत्र प्रचलित हैं। आदि शंकराचार्य ने हनुमन्मंत्र चमत्कारानुष्ठान पद्धति' की रचना की। इस ग्रंथ में हनुमान साधना से संबंधित महत्वपूर्ण मंत्र दिए गए हैं। साधक अपनी बाधाओं के अनुसार इन मंत्रों का जप कर अनुष्ठान कर सकता है।
यहां कुछ अति चमत्कारी मंत्र प्रस्तुत किए जा रहे हैं जिनके शुक्ल पक्ष के एक मंगलवार से अगले मंगलवार तक ग्यारह हजार जप करना चाहिए। अनुष्ठान आरंभ करने से पहले हनुमान की पूजा करनी चाहिए। इस अनुष्ठान के लिए मंत्र सिद्ध और प्राण प्रतिष्ठित हनुमान गुटिका लाल कपड़े में बांधकर काले डोरे से अपने गले में धारण कर हनुमान चित्र/विग्रह के आगे अनुष्ठान करें :
मंत्र :
ओमक्कनमो हनुमते रुद्रावताराय विश्वरूपाय अमित-विक्रमाय प्रकटपराक्रमाय महाबलाय सूर्य- कोटिसमप्रभाय रामदूताय स्वाहा॥
ओमक्कनमो हनुमते रुद्रावताराय सर्वशत्रुसंहारणाय सर्वरोगहराय सर्ववशीकरणाय रामदूताय स्वाहा॥
ओमक्कनमो हनुमते रुद्रावताराय भक्तजनमनः कल्पना-कल्पद्रुमाय दुष्टमनोरथस्तम्भनाय प्रभंजन- प्राप्रियाय महाबलपराक्रमाय महाविपत्तिनिवारणाय पुत्रपौत्रधन-धान्यादि विविध सम्पत्प्रदाय राम दूताय स्वाहा॥
ओमक्कनमो हनुमते रुद्रावतराय वज्रदेहाय वज्रनखाय वज्रसुखाय वज्ररोम्णे वज्रनेत्राय वज्रदन्ताय वज्रकराय वज्रभक्ताय रामदूताय स्वाहा॥
ओमक्कनमो हनुमते रुद्रावताराय परयंत्रमंत्र - तंत्रत्राटकनाशकाय सर्वजवरच्छेकाय सर्वव्याधिनिकृन्तकाय सर्वभयप्रशमनाय सर्वदुष्टमुखस्तम्भनाय सर्व कार्यसिद्धि प्रदाय रामदूताय स्वाहा॥
ओमक्कनमो हनुमते रुद्रावताराय देवदानवयक्षराक्षस - भूत - प्रेत - पिशाच - डाकिनी - दुष्टग्र बंधनाय रामदूताय स्वाहा॥
ओम नमो हनुमते रूद्रावताराय पंचवदनाय पश्चिममुखे गरूडाय सकलविन निवारणाय रामदूताय स्वाहा॥
(एम.एल. आचार्य)
Futuresamachar
धर्मेन्द्र सिंह चौहान 09457677900 (प्रभु कृपा)
प्रस्तुतकर्ता Dharmendra Singh Chauhan पर 10:06 am
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Tuesday, 21 March 2017
कल्पद्रुम मतानुसार ब्राह्मण अर्थ
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१
सम्पाद्यताम्अवलोकनेन अलम् ।अन्यभाषया पठ्यताम्
ब्राह्मण
यन्त्रोपारोपितकोशांशः सम्पाद्यताम्
कल्पद्रुमः सम्पाद्यताम्

पृष्ठभागोऽयं यन्त्रेण केनचित् काले काले मार्जयित्वा यथास्रोतः परिवर्तयिष्यते। तेन मा भूदत्र शोधनसम्भ्रमः। सज्जनैः मूलमेव शोध्यताम्।
ब्राह्मणम्, क्ली, (ब्रह्मन् + अण् न टिलोपः ।) ब्रह्म- संघातः । ब्राह्मणसमूहः । वेदभागः । इति मेदिनी । ने, ६७ ॥
ब्राह्मणः, पुं, ब्राह्मणो विप्रस्य प्रजापतेर्वा अपत्यम् । ब्रह्म वेदस्तमधीते वा सः । इति भरतः ॥ (ब्रह्मन् + अण् “ब्राह्मोऽजातौ ।” ६ । ४ । १७१ । इति नटिलोपः ।) तत्पर्य्यायः । द्विजातिः २ अग्रजन्मा ३ भूदेवः ४ बाडवः ५ विप्रः ६ । इत्यमरः ॥ २ । ७ । ४ । ॥ द्बिजः ७ सूत्र- कण्ठः ८ ज्येष्ठवर्णः ९ अग्रजातकः १० द्विजन्मा ११ वक्त्रजः १२ मैत्रः १३ वेदवासः १४ नयः १५ गुरुः १६ । इति शब्दरत्नाबली ॥ ब्रह्मा १७ षट्कर्म्मा १८ द्विजोत्तमः १९ । इति राजनिर्घण्टः ॥ * ॥ अयं सर्व्ववर्णश्रेष्ठः । ब्रह्मणो मुखाज्जातः । प्लक्षद्वीपे तस्य संज्ञा हंसः । शाल्मलद्वीपे श्रुतिधरः । कुशद्वीपे कुशलः । क्रौञ्चद्वीपे गुरुः । शाकद्वीपे ऋतव्रतः । पुष्कर- द्वीपे सर्व्वे एकवर्णाः । अस्य शास्त्रनिरूपित- धर्म्मास्त्रयः अध्ययनं यजनं दानञ्च । जीविका- स्तिस्रः अध्यापनं याजनं प्रतिग्रहश्च । अयमा- श्रमचतुष्टयवान् भवति । यथा । ब्रह्मचारी गृहस्थः वानप्रस्थः सन्न्यासी च । क्षत्त्रियवैश्य- योस्तु क्रमश एकैकपादहीनत्वमिति बोध्यम् । इति श्रीभागवतम् ॥ * ॥ ब्राह्मणीक्षत्त्रिया- वैश्यासु ब्राह्मणाज्जातो ब्राह्मणः । यथा, -- “ब्राह्मण्यां ब्राह्मणाज्जातो ब्राह्मणः स्यान्न संशयः । क्षत्त्रियायां तथैव स्याद्वैश्यायामपि चैव हि ॥” इति महाभारते अनुशासने । ४७ । २८ ॥ तस्य लक्षणं यथा, -- “जात्या कुलेन वृत्तेन स्वाध्यायेन श्रुतेन च । एभिर्युक्तो हि यस्तिष्ठेन्नित्यं स द्बिज उच्यते ॥” इति वह्रिपुराणम् ॥ अपि च । “न क्रुध्येन्न प्रहृष्येच्च मानितोऽमानितश्च यः । सर्व्वभूतेष्वभयदस्तं देवा ब्राह्मणं विदुः ॥ न्निर्वपेदिति विशेषावधारणकल्पना ९ । एव- मन्यदपि उदाहार्य्यम् ॥ न च हेत्वादीनामन्यतमं ब्राह्मणमिति लक्षणम् । मन्त्रेष्वपि हेत्वादि- सद्भावात् । इन्दवोवामुशन्तिहीति हेतुः । उदानिषुर्महीरिति तस्मादुदकसुच्यते इति निर्वचनम् । मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः इति निन्दा । अग्निर्मूर्द्धादिवः इति प्रशंसा । अधः स्विदासीदुपरिस्विदासीति संशयः वसन्ताय कपिञ्जलानालभत इति विधिः सहस्रमयुताद- द्दितिपरकृतिः । यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवा इति पुराकल्पः । इति करणबहुलं ब्राह्मणमिति चेत् न इत्यददा इत्ययजथा इत्यपच इति ब्राह्मणो गायेदित्यस्मिन् ब्राह्मणेन गातव्ये मन्त्रेऽतिव्याप्तेः । इत्याहेत्यनेन वाक्येनोपनिबद्धं ब्राह्मणमिति चेन्न राजाचिद्यं भगं भक्षीत्याह यो वा रक्षाः शुचिरस्मीत्याह इत्यनयोर्मन्त्रयो- रतिव्याप्तेः आख्यायिकारूपं ब्राह्मणमिति चेन्न यमयमीसंवादसूक्तादावतिव्याप्तेः तस्मान्नास्ति ब्राह्मणस्य लक्षणमिति प्राप्ते ब्रूमः मन्त्रब्राह्मण- रूपौ द्वावेव वेदभागौ इत्यङ्गीकारात् मन्त्र- लक्षणस्य पूर्ब्बमभिहितत्वादवशिष्टो वेदभागो ब्राह्मणमित्येतल्लक्षणं भविष्यति । तदेतल्लक्षण- द्वयं जैमिनिः सूत्रयामास तच्चोदकेषु मन्त्रा- ख्याशेषे ब्राह्मणशब्द इत्यादि ॥” विष्णुः । यथा, महाभारते । १३ । १४९ । ८४ । “ब्रह्मविद्ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः ॥” शिवः । यथा, तत्रैव । १३ । १७ । १३३ । गभस्तिब्रह्मकृद्ब्रह्मा ब्रह्मविद् ब्राह्मणो गतिः ॥” ब्रह्म जानातीति व्युत्पत्त्या परब्रह्मवेत्तरि, त्रि ॥)
अमरकोशः सम्पाद्यताम्

पृष्ठभागोऽयं यन्त्रेण केनचित् काले काले मार्जयित्वा यथास्रोतः परिवर्तयिष्यते। तेन मा भूदत्र शोधनसम्भ्रमः। सज्जनैः मूलमेव शोध्यताम्।
ब्राह्मण पुं।
ब्राह्मणः
समानार्थक:द्विजाति,अग्रजन्मन्,भूदेव,वाडव,विप्र,ब्राह्मण,द्विज,ब्रह्मन्
2।7।4।2।2
आश्रमोऽस्त्री द्विजात्यग्रजन्मभूदेववाडवाः। विप्रश्च ब्राह्मणोऽसौ षट्कर्मा यागादिभिर्वृतः॥
: यागादिषट्कर्मयुक्तविप्रः, यागे_यजमानः
पदार्थ-विभागः : , द्रव्यम्, पृथ्वी, चलसजीवः, मनुष्यः
वाचस्पत्यम् सम्पाद्यताम्

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ब्रा(व्रा)ह्मण¦ पुंस्त्री॰ ब्रह्म वेदं शुद्धं चैतन्यं वा वेत्त्यधीते वाअण्
“ब्रह्मणो जाताविति” पा॰ न टिलोपः ब्रह्मणोमुखजातत्वात् ब्रह्मणोऽपत्यम् वा अण्।
१ विप्रे जाति-भेदे स्त्रियां जातित्वात् ङीष्।
२ पुक्कायां स्त्री ङीप्।
“ब्रह्म जानाति ब्राह्मणः” इत्युक्ते
३ परब्रह्मज्ञे त्रि॰। ब्राह्मणक्षेत्रे ब्राह्मणाज्जातदेहे तत्सङ्कल्पजातदेहे चबाह्मणत्वजातिः स्वीक्रियते यथा गोमयवृश्चिकोभयजातदेहस्य वृश्चिकत्वं तद्वत्। तत्र सङ्कल्पजाते देहेब्राह्मणत्वं यथा नारदद्रोणादौ। इदानीञ्च ब्राह्मणस्यसत्यसकल्पत्वाभावान्न तथात्वम्। किञ्च कलौ असवर्णाविवाहनिषेधादपि न तथात्वम्। [Page4611-a+ 38]
“ब्राह्मण्यां ब्राह्मणाज्जाती ब्राह्मणः स्यान्न संशयः। क्षत्रियायां तथैव स्याद्वैश्यायामपि चैव हि” भा॰ दानधर्म-वाक्यस्यापि संकल्पभेदादेव तथात्वेन युगान्तरविषयत्वम्। तस्य लक्षणं यथा
“क्षात्या कुलेन वृत्तेन स्वाध्यायेन श्रुतेनच। एभिर्युक्तो हि यस्तिष्ठेन्नित्यं स द्विज उच्यर्ते” वह्निपु॰।
“न क्रुध्येन्न प्रह्रष्टेच्च मानितोऽमानितश्च यः। सर्वभूतेष्वभयदस्तं--देवा ब्राह्मणं विदुः। अहेरिव गणा-द्भीतः सौहित्यान्नरकादिव। कुणपादिव च स्त्रीभ्यस्तंदेवा ब्राह्मणं विदुः। येन केनचिदाच्छन्नो येन केनचि-दाशितः। यत्र क्व चन शायी च तं देवा ब्राह्मणं विदुः। विमुक्तं सर्वसङ्गेभ्यो मुनिमाकाशवत् स्थितम्। अस्वमेक-चरं शान्तं तं देवा ब्राह्मणं विदुः। जीवितं यस्य ध-र्मार्थं धर्मो रत्यर्थमेव च। अहोरात्रश्च पुण्यार्थस्तंदेवा ब्राह्मणं विदुः। निराशिषमनारम्भं निर्नमस्कर-मस्ततिम्। अक्षीणं क्षीणकर्माणं तं देवा ब्राह्मणंविदुः” भा॰ मोक्षध॰।
“विशाखयूप उवाच। विप्रस्यलक्षणं ब्रूहि त्वद्भक्तिः का च तत्कृता। यतस्तवानु-ग्रहेण वाग्बाणाः ब्राह्मणाः कृताः”। कल्किरुवाच
“वेदास्तमोश्वरं प्राहुरष्यक्तं व्यक्तिमत् परम्। ते वेदा ब्रा-ह्मणमुखे नानाधर्माः प्रकाशिताः। यो धर्मो ब्राह्मणानांहि सा भक्तिर्मम पुष्कला। तयाहं तोषितः श्रीशःसंभवामि युगे युगे। ऊर्द्ध्वन्तु त्रिवृतं सूत्रं सधवानि-र्मितं शमैः। तन्तुत्रयमधोवृत्तं यज्ञसूत्रं विदुर्बुधाः। त्रिगुणं तद्ग्रन्थियुक्तं वेदप्रवरसम्मितम्। शिरोधरा-न्नाभिमध्यात् पृ{??}र्द्धपरिमाणकम्। यजुर्विदां नाभि-मितं सामगानामयं विधिः। वामस्कन्धेन विधृतं यज्ञ-सूत्रं बलप्रदम्। मृद्भस्मचन्दनाद्यैस्तु धारवेत्तिलकंद्विजः। भाले त्रिपुण्ड्रं कर्माङ्गं केशपर्य्यन्तमुज्ज्वलम्। पुण्ड्रमङ्गुलिमानन्तु त्रिपुण्ड्रं तत्त्रिधा कृतम्। ब्रह्म-विष्णुशिवावासं दर्शनात् पापनाशनम्। ब्राह्मणानांमुखे स्यर्गा वाचि वेदाः करे हरिः। गात्रे तीर्थानियागाश्च{??} प्रकृतिस्त्रिवृत्। सावित्री कण्ठकुहराहृदयं ब्रह्मसङ्गतम्। तेषां स्तनान्तरे धर्मः पृष्ठेऽधर्मःप्रकीर्त्तितः। भूदेवा ब्राह्मणा राजन्! पूज्या वन्द्याःसदुक्तिभिः। चातुराश्रम्यकुशला मम धर्मप्रवर्त्तकाः। व लाश्चापि ज्ञानवृद्धास्तपोवृद्धा मम प्रियाः। तेषांवचः पालयितुमवताराः कृता मया। माहाभाग्यं ब्रा-ह्मणानां सर्वपापप्रणाशनम्। कलिदोषहरं श्रुत्वा[Page4611-b+ 38] मुच्यते सर्वतोभयात्” कल्किपु॰
४ अ॰।
“कर्मणा ब्रह्मणोजातः करोति ब्रह्मभावनाम्। स्वधर्मनिरतः शुद्वस्तस्माद्-ब्राह्मण उच्यते” ब्रह्मवे॰ गणेशख॰
३५ अ॰।
“जातकर्मादिभिर्यस्तु संस्कारैः संस्कृतः शचिः। वेदाध्ययनसम्पन्नः षट्सु कर्मस्ववस्थितः। शौचाचार-परो नित्यं विघसाशी गुरुप्रियः। नित्यव्रती सत्यरतःस वै ब्राह्मण उच्यते। सत्यं दानमथाऽद्रोह आनृशंस्यकृपा घृणा। तपश्च दृश्यते यत्र स ब्रह्मण इतिस्मृतः”। तस्य धर्मो यथा
“ब्राह्मस्य तु यो धर्मस्तं तेवक्ष्यामि केवलम्। दममेव महाराज। धर्ममाहुः पुरा-तनम्। स्वाध्यायाभ्यसनञ्चैव तत्र कर्म समाप्यते। तञ्चेद्वित्तमुपागच्छेद्वर्त्तमानं स्वकर्मणि। अकर्वाणंविकर्माणि श्रान्तं प्रज्ञानतर्पितम्। कुर्वीतोपेत्य सन्तान-मथ दद्याद्यजेत च। संविभज्यापि भोक्तव्यं धनं सद्भि-रितीष्यते। परिनिष्ठितकार्य्यस्तु स्वाध्यायेनैव ब्राह्मणः। कुर्य्यादन्यन्न वा कुर्य्यान्मैत्रो ब्राह्मण उच्यते” पाद्मेस्वर्गख॰
२६ अ॰। तस्य माहात्म्यादि यथा।
“सर्वेषा-मेव वर्णानां ब्राह्मणः परमो गुरुः। तस्मै दानानिदेयानि भक्तिश्रद्धासमन्वितैः। सर्वदेवाग्रजो विप्रःप्रत्यक्षत्रिदशो भुवि। स तारयति दातारं द्स्तरेविश्वसागरे। हरिशर्मोवाच। सर्ववर्णगुरुर्विप्रस्त्वयाप्रोक्तः सुरोत्तम!। तेषां मध्ये च कः श्रेष्ठः कस्मै दानंप्रदीयते। ब्रह्मोवाच। सर्वेऽपि ब्राह्मणाः श्रेष्ठाःपूजनीयाः सदैव हि। अविद्या वा सविद्या वा नात्रकार्य्या विचारणा। स्तेयादिदोषलिप्ता ये ब्राह्मणाब्राह्मणोत्तम!। आत्मभ्यो द्वेषिणस्तेऽपि परेम्यो नकदाचन। अनाचारा द्विजाः पूज्या न च शूद्रा जिते-न्द्रियाः। अभ्यक्ष्यमक्षंका गावः कोलाः सुमतयो न च। माहात्म्यं भूमिदेवानां विशेषादुच्यते मया। तव स्ने-हाद्द्विजश्रेष्ठ! निशामय समाहितः। क्षत्रियाणाञ्चवैश्यानां शूद्राणां गुरवो द्विजाः। अन्योऽन्यं गुरवोज्ञेयाः पूजनीयाश्च भूसुर!। ब्रह्मणं प्रणमेदयस्तु विष्णु-बुद्ध्या नरोत्तमः। आयुः पुत्राश्च कीर्त्तिश्च सम्पत्ति-स्तस्य वर्द्धते। न च नौति द्विजं यस्तु मूढधीर्मानवीभुवि। सुदर्शनेन तच्छीर्षं हन्तुसिच्छति केशवः”। पुष्पादिहस्तस्य विप्रस्य प्रणामनिषेधो यथा।
“पुष्प-हस्तं पयोहस्तं देवहस्तञ्च भूसुर!। न नमेद ब्राह्मणप्रातस्तैसाभ्यङ्गितविग्रहम्। जलस्थं देव{??} ध्यान-[Page4612-a+ 38] माज्जतचेतसम्। देवपूजाञ्च कुर्वन्तं न नमेद् ब्राह्मणंबुधः। बहिष्क्रिया। प्रकुर्वन्तं भुञ्जानञ्च द्विजोत्तम!। तथा सामानि गाय{??} न नमेद् ब्राह्मणं बुधः। ब्राह्मणायत्र तिष्ठन्ति बहवीं द्विजसत्तम। प्रत्येकन्तु वमस्कार-स्तत्र कार्य्यो न धीमता। कृताभिवादनं विप्रं भक्त्या योनाभिवादयेत्। स चाण्डालसमो ज्ञेयो नाभिवाद्यःकदापि च। कृतप्रणामं तनयं नमेतां पितरौ न च। कृनप्रणामाः सर्वेऽपि नमस्कार्य्या द्विजैर्द्विजाः। कृत-दोषान् द्विजान् गाश्च न द्विषन्ति विचक्षणाः। द्विषन्तिघापि मोहेन तेषां रुष्टः सदा हरिः। याचकान् ब्राह्म-णान् यस्तु कोपदृष्ट्या प्रपश्यति। सूचीप्रक्षेपणं तस्यनेत्रयोः कुरुते यमः। विपनिर्भर्त्सनं मूढा येन वक्त्रेणकुर्वते। तस्मिन् वर्क्त्र यमस्तप्तं लौहपिण्डं ददाति वै। ब्राह्मणो यद्गृहे भुङक्त तद्गृहे केशवः स्वयम्। देवताः सकला एव पितरश्च सुरर्षयः। तस्य पादोदकादिमाहात्म्य यथा
“विप्रपादोदकं यस्तु कणमात्रंबहेद्बुधः। देहस्थ पातकं तस्य सर्वमेवाशु नश्यति। कीटिब्रह्माण्डमध्येषु सन्ति तीर्थानि यानि च। तानि स-र्वाणि तीर्थानि वसन्ति द्विजपादयोः। विप्रपादोदकैर्नित्यंसिक्तं स्याद् यस्य मस्तकम्। स स्नातः सर्वतीर्थेषु सर्वय-ज्ञेषु दीक्षितः। सर्वपापानि घोराणि विप्रहत्यादिकानिच। सद्य एव विनश्यन्ति विप्रपादाम्बुधारणात्। क्षयाद्याव्याधयः सर्वे परमक्लेशदायकाः। गच्छन्ति विलय सद्योविप्रपादाम्ब भक्षणात्। पित्रर्थं यानि तोयानि दीयन्तेविप्रपादयोः। तस्तृप्ताः पितरः स्वर्गे तिष्ठन्त्याचन्द्र-तारकम्। प्रक्षाल्य विप्रचरणौ दूर्वाभिर्योऽर्चयेद्बुधः। तेनाचितो जगत्स्वामी विष्णुः सर्वसुरोत्तमः। विप्राणांपादनिर्माल्यं यो मर्त्यः शिरसा वहेत्। सत्यंसत्यमहं वच्मि तस्य मुक्तिर्हि शाश्वती”। तस्य प्रद-क्षिणफलम्
“विप्रं प्रदक्षिणीकृत्य वन्दते यो नरोत्तमः। प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुन्धरा”। तस्य पादसेवनफलम्
“यो दद्यात् फलताम्बूलं विप्राणां पाद-सेवने। इह लोके सुखं तस्य परलोके ततोऽधिकम्। पुत्रार्थी लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम्। मोक्षार्थीलभते मोक्षं विप्रपादस्व सेवनात्। रोगी रोगात् प्रमु-च्येत पापी मुच्येत पातकात्। मुच्येत बन्धनाद्बद्धोविप्राणां पादसेवनात। अनपत्याश्च या नार्य्यो मृताऽ-पत्याश्च या स्त्रियः। बह्वपत्या जीववतसाः स्वुर्विप्रपाद-[Page4612-b+ 38] सेवनात्” पाद्मे क्रियायोगसारे
२ अ॰। तस्य सन्ध्या-वन्दनाकरणे दोषो यथा
“नोपतिष्ठति यः पूर्वां नो-पास्ते यस्तु पश्चिमाम्। स शूद्रवद्वहिः कार्य्यः सर्व-स्माद् द्विजकर्मणः” मनुः। अन्यत्र च
“न गृह्णन्ति सुरा-स्तेषां पितरः पिण्डतर्पणम्। स्वेच्छया च द्विजातेश्चात्रिसन्ध्यरहितस्य च। तस्य सन्ध्याबन्दनफलं यथा
“याजज्जीवनपर्य्यन्तं यस्त्रिसन्ध्यं करोति हि। स चसूर्य्यसमो बिप्रस्तेजसा तपसा सदा। तत्पादपद्मरजसासद्यः पूता वसुन्धरा। जीवन्मुक्तः स तेजस्वी सन्ध्यापूतो हि यो द्विजः। तीर्थानि च पवित्राणि तस्य सं-स्पर्शमात्रतः। ततः पापानि यान्त्येव वैनतेयादिवो-रगाः। तस्य निन्द्यकर्माणि यथा
“विष्णुमन्त्रविहीनश्च त्रिसन्ध्यरहितो द्विजः। एकादशीविहीनश्चविषहीनो यथोरगः। हरेर्नैवद्यभोगी न धारको वृष-वाहकः। शुद्रान्नभोजी विप्रश्च विषहीनो यथोरगा। शवदाही च शूद्राणां यो विप्रा वृषलीपतिः। शूद्राणांसूपकारी च शूद्रयाजी च यो द्विजः। असिजीवी-मसीजीवी विषहीनो यथोरगः। यो विप्रोऽवीरान्नभोजी ऋतुस्नातान्नभोजकः। भगजीवी बार्द्धुषिकोविषहीनो यथोरगः। यः कन्याविक्रयी विप्रो योहरेर्नामविक्रयी। यो विद्याविक्रयी विप्रो विषहीनोयथोरगः। सूर्य्योदये च द्विर्भोजी मत्स्यभोजी च योद्विजः। शिवपूजादिरहितो विषहीनो यथोरगः”। ब्रह्मवै॰ प्र॰
२१ अ॰। अन्यत्र च
“यदि शूद्रां व्रजेद्विप्रोवृषलीपतिरेव सः। स भ्रष्टो विप्रजातेश्च चाण्डालात्सोऽधमः स्मृतः। विष्ठासमश्च तत्पिण्डो मूत्रं तस्य चतर्पणम्। तत्पितृणां सुराणाञ्च पूजने तत् समं सति!। काटिजन्मार्जितं पुण्यं सन्ध्यार्चातपसाऽर्जितम्। द्विजस्यवृषलीभोगान्नश्यत्येव न संशयः। ब्राह्मणश्च सुरापीतःविड्भोजी वृषलीपतिः। हरिवासरभोजी च कुम्भी-पाकं व्रजेद्ध्रुवम्”।
“करोत्यशुद्धां सन्ध्याञ्च सन्ध्यांवा न करोति यः। त्रिसन्ध्यं वर्जयेद् यो वा सन्ध्या-हीनश्च स द्विजः”। नारायणक्षेत्रादितीर्थे तस्य प्रति-ग्रहदोषो यथा
“तत्र नारायणक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे हरेःपदे। वाराणस्यां वदर्य्याञ्च गङ्गासागरसङ्गमे। पुष्करेभास्करक्षेत्रे प्रभासे रासमण्डले। हारद्वारे च केदा{??}सोमे वदरपाचने। सरस्वतीनदीतीरे पुण्ये वृन्दा-वने वने। गोटावर्य्याञ्च कौशिक्यां त्रिवेण्याञ्च हिमा-[Page4613-a+ 38] लये। एतेष्वन्धेषु यो दानं प्रतिगृह्णाति कामतः। स च तीर्थप्रतिग्राही कुम्भीपाकं प्रयाति च”। पारि-भाषिकमहापातकिब्राह्मणा यथा
“सप्तोद्रिक्तशूद्रयाजीग्रामयाजीति कीर्त्तितः। देवोपजीवजीवी च देवलश्चप्रकीर्त्तितः। शूद्रपाकोपजीवी यः सूपकारः प्रकीर्त्तितः। सन्ध्यापूजाविहीनश्च प्रमत्तः पतितः स्मृतः। एते महा-पातकिनः कुम्भीपाकं प्रयान्ति ते” ब्रह्मवै॰ ज॰ ख॰
२७ अ॰।
“ब्राह्मणस्य स्वधर्मश्च त्रिसन्ध्यमर्चन हरेः। तत्पादोदकनैवेद्यभक्षणञ्च सुधाधिकम्। अन्नं विष्ठा जलं मूत्रमनिवेद्यहरेर्नृप। भवन्ति शूकराः सर्वे ब्राह्मणा यदि भुञ्जते। आजीवं भुञ्जते विपा एकादश्यां न भुञ्जते। कृष्णजन्म-दिने चैव शिवरात्रौ सुनिश्चितम्। तथा रामनवम्याञ्चयत्रतः पुण्यवासरे। ब्राह्मणानां स्वधर्मश्च कथितो वे-धसा नृप।
५९ अ॰। गृहस्थब्राह्मणनियमा यथा{??}वेदं वेदौ तथा वेदानधीत्य तु समाहितः। तदर्थमभि-गम्याथ ततः स्नायाद् द्विजोत्तमः। गुरुवे तु धनं दत्त्वास्नायीत तदनुज्ञया। चीर्णव्रतोऽथ मुक्तात्मा ह्यशक्तःस्नातुमर्हति। वैणवीन्धारयेद्यष्टिमन्तर्वासस्तथोत्तरम्। यज्ञोपवीतद्वितयं सोदकञ्च कमण्डलुम्। छत्रञ्चोष्णीष-ममलं पादुके चाप्युपानहौ। रौक्मे च कुण्डले धार्य्येकृत्तकेशनखः शुचिः। स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद्बहिर्माल्यं न धारयेत्। अन्यत्र काञ्चनाद्विप्रो न रक्तां बि-भृयात स्रजम्। शुक्लाम्बरधरो नित्यं स्रग्गन्धः प्रिय-ष्टर्शनः। नजीर्णमलवद्वासा भवेच्च विभवे सति। न रक्तसुल्वणञ्चान्यधृतं वासो न कुण्डिकाम्। नोपानहौ स्रजंप्राथ पादुके च प्रयोजयेत्। उपवीतमलङ्कारं कुम्भान्कृष्णाजिनानि च। नापसव्यं परीदध्याद्वासा न विकृतंवसेत्। आहरेद्विधिवद्धीमान् सदृशानात्मनः शुभान्। रूपलक्षणसंयुक्तां योनिदोषविवर्जिताम्। अमातृ-गोत्रप्रभवामसमानार्षगोत्रजाम्। आहरेद्ब्राह्मणोभार्य्यां शीलशौचसमन्विताम्। ऋतुकालाभिगामीस्याद् यावत् पुत्रोऽभिजायते। वर्जयेत् प्रतिषिद्धानि प्रय-त्रेन दिनानि तु। ष{??}ष्टमी पञ्चदशी द्वादशी च चतु-र्दशी। ब्रह्मचारी भवेक्षित्यं तद्वज्जन्मक्षयाहनि।{??}दधीतावसथ्याग्निं जुहुवाज्जातवेद{??}म्। व्रतानि{??}तको नित्यं पावनानि च पालयेत्। येदोदितं स्वकंकर्म नित्यं कुर्य्यादतन्द्रियः। अकुर्वाणः पतत्याशु नर-{??}। अभ्यपेत पसतो नित्यं वेदं यज्ञान्न-[Page4613-b+ 38] हापयेत्। कुर्य्यात् गृह्याणि कर्माणि सन्ध्योपासनमेवच। सख्यं समाधिकैः कुर्य्यादुपेयादीश्वरं सदा। दैवता-न्यपि गच्छेत् तु कुर्य्याद्भार्य्याभिपोषणम्। न धर्मंख्यापयेद्विद्वान् न पापं घयेदर्पि। कुर्वीतात्महितंनित्यं सर्वभूतानुकम्पकः। वयसा कर्मणाऽर्थस्य श्रुत-स्याभिजनस्य च। देशवागबद्धिसारूप्यमाचरन् विचरेत्सदा। श्रुतिस्मृत्युदितं सम्यक साधुभिर्यश्च सेवितः। तमात्मवन्निषेवेतं नेहेतान्यत्र कर्हिचित्। येनास्य पि-तरो याता येन याताः पितामहाः। तेन यायात्सतां मार्गं तेन गच्छन्न रिष्यति। नित्यं स्वाध्यायशीलः स्यान्नित्य यज्ञोपवीतवान्। सत्यवादी जित-क्रोधो ब्रह्मपूयाय कल्पते। सन्ध्यास्नानरतो नित्यं ब्रह्म-यज्ञपरायणः। अनुसूयुर्मृदुर्दान्तो गृहस्थः प्रत्य-यान्विता। वीतरागभयक्रोधो लोभमोहविवर्जितः। सावित्रीजापनिरतः श्रद्धावान् मुच्यते गृही। माता-पित्रोर्हिते युक्तो गोब्राह्मणहिते रतः। दाता यज्वादेवभक्तो ब्रह्मलोके महीयते। त्रिवर्गसेवी सततं देव-तानाञ्च पूजनम्। कुर्य्यादहरहर्नित्यं नमस्येत प्रयतःसुरान्। विभागशीलः सततं क्षमायुक्तो दयात्मकः। गृहस्थस्तपसा युक्तो न गृहेऽपि गृही भवेत्। क्षमादया च विज्ञानं सत्यञ्चैव दमः शमः। अध्यात्मनित्यता ज्ञानमेतद्ब्राह्मणलक्षणम्। एतस्मान्न प्रमा-द्येत विशेषेण द्विजोत्तमः। यथाशक्ति चरन् कर्मनिन्दितानि विवर्जयेत्। विधूय मोहकलिल लब्धायोगमनुत्तमम्। गृहस्थो मुच्यते बन्धान्नात्र कार्य्या-विचारणा। विगर्हातिक्रमक्षेपहिंसाबन्धबधात्मकान्। अन्यमन्युसमुत्थानां दोषाणां बर्जनं क्षमा। स्वदुः-खेष्विव कारुण्यं परदु खेषु सौहृदात्। दया यांमुनयः प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य साधनम्। चतुर्दशानांविद्यानां धारणं हि यथार्थतः। विज्ञानमेतच्च विद्याद्येन धर्मो विवर्द्धते। अधीत्य विधिवद्विद्यामर्थञ्चैवोप-लभ्य तु। धर्मकार्य्यान्निवृत्तश्चेन्न तद्विज्ञानमिष्यते। सत्येन लोकं जयति सत्यन्तत् परमं पदम्। यथाभूतप्रसादन्तु सत्यमाहुर्मनीषिणः। दमः शरीरावनतिः शमःप्रज्ञाप्रसादजः। अध्यात्ममक्षरं विद्याद्यत्र गत्वा नशोचति। यथा स देवो भगवान् विद्यया शिव! वेद्यते। साक्षादेव महादेव! तज्ज्ञानमिति कीर्त्तितम्। तन्निष्ठ-स्तत्परो विद्धान्नित्यमक्रोधनह् शृचिः।{??}यज्ञपरो[Page4614-a+ 38] विप्रो लभते तदनुत्तमम्। धर्मस्यायतनं यत्नाच्छरीरंपरिपालयेत्। न हि देहं विना रुद्र! पुरुषैर्विद्यते परः। नित्यं धर्मार्थकामेषु युञ्जीत नियतो द्विजः। न धर्मवर्जितं काममर्थं वा मनसा स्मरेत्। सीदन्नपि स्वधर्मेणन त्वधर्मं समाचरेत्। धर्मो हि भगवान् देवो गतिःसर्वेषु जन्तुषु। भूतानां प्रियकारी स्यान्न परद्रोहक-र्मधीः। न वेददेवतानिन्दां कुर्य्यात्तैश्च न संवदेत्। यस्त्विपं नियतो विप्रो धर्माध्यायं पठेत् शुचिः। अघ्या{??}च्छावयेद्वा ब्रह्मलोके महीयते”। कूर्मपु॰
१ {??} उवाच। आनृशंस्यं क्षमा सत्यमहिंसादममार्जवम्। ध्यानं प्रसादो माधुर्य्यं मार्दवं शौचमेवच। इज्या दानं तपः सत्यं स्वाध्यायीह्यात्मनिग्रहः। व्रतोपवासौ मौनञ्च स्नानं पैशुन्यवर्जनम्। एभिर्युक्तोमुनिश्रेष्ठा! यः सदा वर्त्तते द्विजः। हुत्वा तु पावकंपूर्वं परं ब्रह्माधिगच्छति। अविद्यो वा सविद्यो वानिरग्निः साग्निकोऽपि वा। यो विप्रस्तपसा युक्तः सपरं स्वर्गमाप्नुयात्। सर्वेषामुत्तमं श्रेष्ठं विमुक्तिफल-दायकम्। ब्राह्मणस्य तपो वक्ष्ये तन्मे निगदतः शृणु। सायं प्रातश्च यः सन्ध्यामुपास्तेऽखिन्नमानसः। जपन्हि पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम्। तपसा भावितोदेव्या ब्राह्मणः पूतकिल्विषः। न सीदेत् प्रतिगृह्णन् सत्वपि पृथ्वीं ससागराम्। द्वे सन्ध्ये ह्युपतिष्ठेत गायत्रींप्रयतः शुचिः। यस्तस्य दुष्कृतं नास्ति पूर्वतः परतोऽपिवा। यज्ञदानरतो विद्वान् साङ्गवेदस्य पाठकः। गायत्रीध्यानपूतस्य कलां नार्हति षोडशीम्। एवं किल्विष-युक्तस्तु विनिर्दहति पातकम्। उभे सन्ध्ये ह्युपासीततस्मान्नित्यं द्विजोत्तमः”। तस्य देहापवित्रताहेतुः यथा
“यथा देहापवित्रत्वं विग्रादीनां यतो भवेत्। देवर्षे!शृणु तत् सर्वं नराणामानुपूर्विकम्। जातके मृतके-ऽस्नाते जलौकाभिः क्षते तथा। अपवित्रो द्विजादीनांदेहः सन्ध्यादिकर्मसु। अपूततनूरुत्सर्गे नरो मूत्रपूरीषयोः। अस्पृश्यस्पर्शने चैव ब्रह्मयज्ञजपादिषु। रक्तपाते नखशृङ्गदन्तखड्गादिभिः क्षते। विप्रादेरशुचिःकायः शस्त्रास्त्रैः कण्टकादिभिः। भुक्तवस्त्राननोच्छि-ष्टेऽपवित्रः कृतषेथुने। शयने ब्राह्मणादीनां शरीरंक्षुरकर्मणि। ज्वरादिभिश्चतुःषष्टिरोगैर्युक्ते द्विजन्मनाम्। बपुरप्रयतं पूजादानहोमजपादिषु। धूमोद्गारे वमौआद्धपतितान्नादिभोजने। तथा च रेतस्खलने मत्या,[Page4614-b+ 38] देहापवित्रता। अपवित्रं द्विजातीनां वपुः स्याद्राहु-दर्शने। गर्हितदानग्रहणे पतिते पातकादिभिः। अ-शौचान्तेन शुद्धिः स्याज्जातके मृतके द्विज!। सर्व-वर्णाश्रमादोनां तनोः सन्ध्यादिकर्मसु” पाद्मोत्तरञ्चण्डे
१०
९ अ॰।
२ मन्त्रेतरवेदभागे न॰ ऋ॰ भाष्योपोद्घाते आशङ्का-पूर्वकं तल्लक्षणमुक्तं यथा
“तत्र ब्राह्मणस्य लक्षणं नास्ति। कुतः? वेदभागानामियत्तानवधारणेन ब्राह्मणभागेष्वन्य-भागेषु च लक्षणस्याव्याप्त्यतिव्याप्त्योः शोधयितुमशक्य-त्वात्। पूर्वोक्तमन्त्रभाग एकः। भागान्तराणि चकानिचित् पूर्वैरुदाहर्तुं संगृहीतानि
“हेतुर्निर्वचनंनिन्दा प्रशंसा संशयो विधिः। परक्रिया पुरुकिल्पोव्यवर्धारणकल्पनेति”।
“तेन ह्यन्नं क्रियत” इति हेतुः
१ ।
“तद्दघ्नी दधित्वमिति” निर्वचनम्
२ ।
“अमेध्या वै माषाःइति निन्दा
३ ।
“वायुर्वे क्षेपिष्ठेति” प्रशंसा
४ ।
“तद्व्यचि-कित्सा जुहवानी
३ मा हौषा
३ मिति” संशयः
५ ।
“यज-मानेन सम्मितौदुम्भरी भवतीति” विधिः
६ ।
“माषानेवमह्यं पचन्तीति” परकृतिः
७ ।
“पुरा ब्राह्मणा अभैषुः” इति पुराकल्पः
८ ।
“यावतोऽश्वान् परिगृह्णीयात्ता-वतो वारुणांश्चतुष्कपालान्निर्वपेदिति” विशेषावधारण-कल्पना
९ । एवमन्यदप्युदाहार्य्यम्। न च हेत्वादीना-मन्यतमं ब्राह्मणमिति लक्षणम्। मन्त्रोष्वपि हेत्वादि-सद्भावात्।
“इन्दवो वा मुशन्ति हीति” हेतुः।
“उदा-निषुर्महीरिति तस्मादुदकमुच्यत इति” निर्वचनम्।
“मोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः” इति निन्दा।
“अग्निर्मूर्द्धादिवः ककुदिति” प्रशंसा।
“अधः स्विदासी
३ दुपरि स्विदासी
३ दिति” संशयः।
“वसन्ताय कपिञ्जलानालभेत” इति विधिः।
“सहस्रमयुतं ददाविति” परकृतिः।
“यज्ञेन यज्ञमयजन्तदेवाः” इति पुराकल्पः। इतिकरणबहुलं ब्राह्मणमितिचेत् न
“इत्यददा इत्ययजथा इत्यपच इति
“ब्राह्मणोगायेत्” इत्यस्मिन् ब्राह्मणेन गातव्ये मन्त्रेऽतिव्याप्तेः। इत्याहेत्यनेन वाक्येनोपनिबद्धं ब्राह्मणमिति चेत् न
“राजा चिदां भगं भक्षीत्याह यो मायातुं यातुधाने-त्याह यो वा रक्षः।
“शुचिरस्मीत्याहे श्रनयोर्मन्त्रयो-रतिव्याप्तेः। आख्यायिकारूपं ब्राह्मणमिति चेत् नयमयमीसंवादसूक्तादावतिव्याप्तेः। तस्मान्नास्ति ब्राह्मण-लक्षणमिति प्राप्ते ब्रूमः मन्त्रब्राह्मणरूपौ द्वावेव वेद-भागावित्यङ्गीकारात् मन्त्रलक्षणस्य पूर्बमभिहितत्वादव-शिष्टो वेदभागो ब्राह्मणमित्येतल्लक्षणं भविष्यति”। [Page4615-a+ 38]
शब्दसागरः सम्पाद्यताम्

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ब्राह्मण¦ m. (-णः) A man of the first Hindu tribe, a Bra4hman. n. (-णं)
1. An assemblage of Bra4hmans, a council, a conclave.
2. A portion of the Ve4das, that which comprises the precepts that inculcate reli- gious duties, the maxims which explain those precepts and the arguments which relate to theology; it is, however, now often blended with other portions. f. (-णी)
1. The wife of a Bra4hman, or a woman of the Bra4hminical tribe.
2. A kind of wasp.
3. A small ant.
4. a potherb, (Ruta graveolens.)
5. A shrub, (Sipho- nanthus Indica.)
5. A sort of grass, (Trigonella corniculata.) E. ब्रह्मन् the Ve4da, &c. अण् aff. and the final syllable of the ori- ginal word retained.
Apte सम्पाद्यताम्

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ब्राह्मण [brāhmaṇa], a. (-णी f.) [ब्रह्म वेदं शुद्धं चैतन्यं वा वेत्त्वधीते वा अण्]
Belonging to a Brāhmaṇa.
Befitting a Brāhmaṇa.
Given by a Brāhmaṇa.
Relating to religious worship.
One who knows Brahma.
णः A man belonging to the first of the four original castes of the Hindus, a Brāhmaṇa (born from the mouth of the puruṣa); ब्राह्मणो$स्य मुखमासीत् Rv.1.9. 12; Ms.1.31,96; (जन्मना ब्राह्मणो ज्ञेयः संस्कारैर्द्विज उच्यते । विद्यया याति विप्रत्वं त्रिभिः श्रोत्रिय उच्यते ॥ or जात्या कुलेन वृत्तेन स्वाध्यायेन श्रुतेन च । एभिर्युक्तो हि यस्तिष्ठेन्नित्यं स द्विज उच्यते ॥).
A priest, theologian.
An epithet of Agni.
N. of the twentyeighth Nakṣatra.
णम् An assemblage or society of Brāhmaṇas.
That portion of the Veda which states rules for the employment of the hymns at the various sacrifices, their origin and detailed explanation, with sometimes lengthy illustrations in the shape of legends or stories. It is distinct from the Mantra portion of the Veda.
N. of that class of the Vedic works which contain the Brāhmaṇa portion (regarded as Śruti or part of the revelation like the hymns themselves). Each of the four Vedas has its own Brāhmaṇa or Brāhmaṇas: ऐतरेय or आश्व- लायन and कौषीतकी or सांख्यायन belonging to the Ṛigveda; शतपथ to the Yajurveda, पञ्चविंश and षड्विंश and six more to the Sāmaveda, and गोपथ to the Atharvaveda.
The Soma vessel of the Brahman priest. -Comp. -अतिक्रमः offensive or disrespectful conduct towards Brāhmaṇas, insult to Brāhmaṇas; ब्राह्मणातिक्रमत्यागो भवता- मेव भूतये Mv.2.1. -अगर्शनम् absence of Brahmanical instruction or guidance; वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च Ms.1.43. -अपाश्रयः seeking shelter with Brāhma- ṇas. -अभ्युपपत्तिः f. protection or preservation of, or kindness shown to, a Brāhmaṇa; ब्राह्मणाभ्युपपत्तौ च शपथे नास्ति पातकम् Ms.8.112. -आत्मक a. belonging to Brāhmaṇas. -घ्नः the slayer of a Brāhmaṇa; स्त्रीबाल- ब्राह्मणघ्नांश्च हन्याद् द्विट्सेविनस्तथा Ms.9.232.
चाण्डालः a degraded or outcast Brāhmaṇa; यथा ब्राह्मणचाण्डालः पूर्व- दृष्टस्तथैव सः Ms.9.87.
the son of a Śūdra father by a Brāhmaṇa woman. -जातम्, -जातिः f. the Brāhmaṇa caste. -जीविका the occupation or means of livelihood prescribed for a Brāhmaṇa; अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा । दानं प्रतिग्रहश्चैव षट्कर्माण्यग्रजन्मनः ॥ षण्णां तु कर्मणामस्य त्रीणि कर्माणि जीविका । याजनाध्यापने चैव विशुद्धाच्च प्रतिग्रहः ॥. -द्रव्यम्, -स्वम् a Brāhmaṇa's property. -निन्दकः a blasphemer or reviler of Brāhmaṇas. -प्रसंगः the applicability of the term Brāhmaṇa. -प्रातिवेश्यः a neighbouring Brāhmaṇa; ब्राह्मणप्रातिवेश्यानामेतदेवानिमन्त्रणे Y.2.263. -प्रियः N. of Viṣṇu. -ब्रुवः one who pretends to be a Brāhmaṇa, one who is a Brāhmaṇa only in name and neglects the duties of his caste; बहवो ब्राह्मणब्रुवा निवसन्ति Dk.; सममब्राह्मणे दानं द्विगुणं ब्राह्मणब्रुवे Ms.7.85;8.2. -भावः the rank or condition of a Brāhmaṇa. -भूयिष्ठ a. consisting for the most part of Brāhmaṇas. -यष्टिका, -यष्टी Clerodendrum Siphonantus (Mar. भारंग). -वधः the murder of a Brāhmaṇa, Brahmanicide. -वाचनम् the recitation of benedictions. -संतर्पणम् feeding or satisfying Brāhmaṇas.
Monier-Williams सम्पाद्यताम्

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ब्राह्मण mfn. relating to or given by a Brahman , befitting or becoming a -BrBrahman , Brahmanical AV. TBr. MBh.
ब्राह्मण m. one who has divine knowledge (sometimes applied to अग्नि) , a Brahman , a man belonging to the 1st of the 3 twice-born classes and of the 4 original divisions of the Hindu body (generally a priest , but often in the present day a layman engaged in non-priestly occupations although the name is strictly only applicable to one who knows and repeats the वेद) RV. etc.
ब्राह्मण m. = ब्राह्मणाच्छंसिन्Ka1tyS3r.
ब्राह्मण m. a Brahman in the second stage (between मात्रand श्रोत्रिय) Hcat.
ब्राह्मण m. N. of the 28th lunar mansion L.
ब्राह्मण n. that which is divine , the divine AV.
ब्राह्मण n. sacred or -ddivine power ib. A1s3vGr2.
ब्राह्मण n. Brahmanical explanation , explanations of sacred knowledge or doctrine ( esp. for the use of the Brahmans in their sacrifices) Br.
ब्राह्मण n. the ब्राह्मणportion of the वेद(as distinct from its मन्त्रand उपनिषद्portion) and consisting of a class of works called ब्राह्मणs (they contain rules for the employment of the मन्त्रs or hymns at various sacrifices , with detailed explanations of their origin and meaning and numerous old legends ; they are said by सायणto contain two parts: 1. विधि, rules or directions for rites ; 2. अर्थ-वाद, explanatory remarks ; each वेदhas its own ब्राह्मण, that of the RV. is preserved in 2 works , viz. the ऐतरेय, sometimes called आश्वलायन, and the कौषीतकिor शाङ्खायन- ब्राह्मण; the white यजुर्-वेदhas the शत-पथ-ब्राह्मण-Br ; the black यजुर्-वेदhas the -Br ब्राह्मणwhich differs little from the text of its संहिता; the SV. has 8 -Br ब्राह्मणs , the best known of which are the प्रौढor पञ्च-विंशand the षड्विंश; the AV. has one -Br ब्राह्मणcalled गो-पथ) Nir. Gr2S3rS. etc.
ब्राह्मण n. the सोमvessel of the ब्रह्मन्priest RV. AV.
ब्राह्मण n. a society or assemblage of Brahmans , a conclave W.
Purana Encyclopedia सम्पाद्यताम्

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BRĀHMAṆA : (BRĀHMIN).
(1) Origin. Brāhmaṇas, Kṣatriyas, Vaiśyas, and Śūdras are the caturvarṇas or the four castes. The Purāṇas say that the four castes originated from different parts of the body of Brahmā. See Manusmṛti, Chapter 1, Stanza 87
“Sarvasyāsya tu sargasya
Guptyarthaṁ sa mahādyutiḥ
Mukhabāhūrūpajjānāṁ
Pṛthakkarmāṇyakalpayat.
(With a view to sustain the world, Brahmā ordered acti- vities, for the four castes (Brāhmaṇa Kṣatriya, Vaiśya, and Śūdra) who were born from his face, arms, thighs and feet). From this statement it is seen that the Brāh- maṇas were born from the face, Kṣatriyas from the arms, Vaiśyas from the thighs and Sūdras from the feet of Brahmā.
2) The activities of a Brāhmaṇa. The duties of a Brāhmaṇa are, performing sacrifice, and encouraging others to perform sacrifice, learning Vedas and teaching Vedas, giving gifts and getting remuneration. A Brāhmaṇa has two births in one life. Till the time of investiture with the sacred string is one birth and from that period on- wards is the second birth. So a Brāhmaṇa is called ‘dvija’ or twice-born.
The Brāhmaṇas were allowed to do the works of agri- culture, keeping cows, trade and commerce and Kusīda (money-lending). Living on the interest of money giving out as loan is Kusīda. But they should not trade on products from cow, jaggery, salt, lac and flesh. The suffix ‘Śarmā’ should be added to the name of Brāhmaṇa. A Brāhmaṇa can have four wives.
_______________________________
*6th word in right half of page 158 (+offset) in original book.
BRĀHMAṆA(M) : See Veda.
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*7th word in right half of page 158 (+offset) in original book.
Vedic Index of Names and Subjects सम्पाद्यताम्

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1. Brāhmaṇa, ‘descendant of a Brahman’ (i.e., of a priest), is found only a few times in the Rigveda,[१] and mostly in its latest parts. In the Atharvaveda[२] and later[३] it is a very common word denoting ‘priest,’ and it appears in the quadruple division of the castes in the Puruṣa-sūkta (‘hymn of man’) of the Rigveda.[४]
It seems certain that in the Rigveda this Brāhmaṇa, or Brahmin, is already a separate caste, differing from the warrior and agricultural castes.[५] The texts regularly claim for them a superiority to the Kṣatriya caste,[६] and the Brahmin is able by his spells or manipulation of the rite to embroil the people and the warriors[७] or the different sections of the warriors.[८] If it is necessary to recognize, as is sometimes done, that the Brahmin does pay homage to the king at the Rājasūya,[९] nevertheless the unusual fact is carefully explained away so as to leave the priority of the Brahmin unaffected. But it is expressly recognized that the union of the Kṣatriya and the Brāhmaṇa is essential for complete prosperity.[१०] It is admitted[११] that the king or the nobles might at times oppress the Brahmins, but it is indicated that ruin is then certain swiftly to follow.
The Brahmins are gods on earth,[१२] like the gods in heaven, but this claim is hardly found in the Rigveda.[१३]
In the Aitareya Brāhmaṇa[१४] the Brahmin is said to be the ‘recipient of gifts’ (ādāyī) and the ‘drinker of the offering’ (āpāyī). The other two epithets applied, āvasāyī and yathākāma-prayāpya, are more obscure; the former denotes either ‘dwelling everywhere’[१५] or ‘seeking food’;[१६] the latter is usually taken as ‘moving at pleasure,’ but it must rather allude to the power of the king to assign a place of residence to the Brahmin.
In the Śatapatha Brāhmaṇa[१७] the prerogatives of the Brahmin are summed up as (1) Arcā, ‘honour’; (2) Dāna, ‘gifts’; (3) Ajyeyatā, ‘freedom from oppression’; and (4) Avadhyatā, ‘freedom from being killed.’ On the other hand, his duties are summed up as (5) Brāhmaṇya, ‘purity of descent’; (6) Pratirūpa-caryā, ‘devotion of the duties of his caste’; and (7) Loka-pakti, ‘the perfecting of people’ (by teaching).
1. Respect paid to Brahmins.--The texts are full[१८] of references to the civilities to be paid to the Brahmin. He is styled bhagavant,[१९] and is provided with good food[२०] and entertainment wherever he goes. Indeed, his sanctity exempts him from any close inquiry into his real claim to Brahminhood according to the Pañcaviṃśa Brāhmaṇa.[२१]
2. Gifts to Brahmins.--The Dānastuti (‘Praise of gifts’) is a recognized feature of the Rigveda, and the greed of the poets for Dakṣiṇās, or sacrificial fees, is notorious. Vedic texts[२२] themselves recognize that the literature thence resulting (Nārā- śaṃsī) was often false to please the donors. It was, however, a rule[२३] that Brahmins should not accept what had been refused by others; this indicates a keen sense of the danger of cheapening their wares. So exclusively theirs was the right to receive gifts that the Pañcaviṃśa Brāhmaṇa[२४] has to explain how Taranta and Purumīḷha became able to accept gifts by composing a Rigvedic hymn.[२५] The exaggerations in the celebration of the gifts bestowed on the priests has the curious result of giving us a series of numerals of some interest (Daśan). In some passages[२६] certain gifts--those of a horse or sheep--are forbidden, but this rule was not, it is clear, generally observed.
3. Immunities of Brahmins.--The Brahmin claimed to be exempt from the ordinary exercise of the royal power. When a king gives all his land and what is on it to the priests, the gift does not cover the property of the Brahmin according to the Śatapatha Brāhmaṇa.[२७] The king censures all, but not the Brahmin,[२८] nor can he safely oppress any Brahmin other than an ignorant priest.[२९] An arbitrator (or a witness) must decide (or speak) for a Brahmin against a non-Brahmin in a legal dispute.[३०]
The Brahmin's proper food is the Soma,[३१] not Surā[३२] or Parisrut,[३३] and he is forbidden to eat certain forms of flesh.[३४] On the other hand, he alone is allowed to eat the remains of the sacrifice,[३५] for no one else is sufficiently holy to consume food which the gods have eaten. Moreover, though he cannot be a physician,[३६] he helps the physician by being beside him while he exercises his art.[३७] His wife[३८] and his cow[३९] are both sacred.
4. Legal Position of Brahmins.--The Taittirīya Saṃhitā[४०] lays down a penalty of a hundred (the unit meant is unknown) for an insult to a Brahmin, and of a thousand for a blow; but if his blood is drawn, the penalty is a spiritual one. The only real murder is the slaying of a Brahmin according to the Satapatha Brāhmaṇa.[४१] The crime of slaying a Brahmin ranks above the sin of killing any other man, but below that of killing an embryo (bhrūṇa) in the Yajurveda;[४२] the crime of slaying an embryo whose sex is uncertain is on a level with that of slaying a Brahmin.[४३] The murder of a Brahmin can be expiated only by the horse sacrifice,[४४] or by a lesser rite in the late Taittirīya Āraṇyaka.[४५] The ritual slaying of a Brahmin is allowed in the later ceremonial,[४६] and hinted at in the curious legend of Śunaḥśepa;[४७] and a Purohita might be punished with death for treachery to his master.[४८]
5. Purity of Birth.--The importance of pure descent is seen in the stress laid on being a descendant of a Ṛṣi (ārṣeya).[४९] But, on the other hand, there are clear traces of another doctrine, which requires learning, and not physical descent, as the true criterion of Ṛṣihood.[५०] In agreement with this is the fact that Satyakāma Jābāla was received as a pupil, though his parentage was unknown, his mother being a slave girl who had been connected with several men,[५१] and that in the Śatapatha Brāhmaṇa[५२] the ceremony on acceptance as a pupil required merely the name of the pupil. So Kavaṣa is taunted in the Rigveda Brāhmaṇas[५३] as being the son of a female slave (Dāsī), and Vatsa cleared himself of a similar imputation by a fire ordeal.[५४] Moreover, a very simple rite was adequate to remove doubts as to origin.[५५] In these circumstances it is doubtful whether much value attaches to the Pravara lists in which the ancestors of the priest were invoked at the beginning of the sacrifice by the Hotṛ and the Adhvaryu priests.[५६] Still, in many parts of the ritual the knowledge of two or more generations was needed,[५७] and in one ceremony[५८] ten ancestors who have drunk the Soma are required, but a literal performance of the rite is excused. Moreover, there are clear traces of ritual variations in schools, like those of the Vasiṣṭhas and the Viśvāmitras.
6. The Conduct of the Brahmin.--The Brahmin was required to maintain a fair standard of excellence.[५९] He was to be kind to all[६०] and gentle,[६१] offering sacrifice and receiving gifts.[६२] Especial stress was laid on purity of speech;[६३] thus Viśvantara's excuse for excluding the Śyāparṇas from his retinue was their impure (apūtā) speech.[६४] Theirs was the craving for knowledge[६५] and the life of begging.[६६] False Brahmins are those who do not fulfil their duties[६७] (cf. Brahmabandhu) . But the penances for breach of duty are, in the Sūtras, of a very light and unimportant character.[६८]
7. Brahminical Studies.--The aim of the priest is to obtain pre-eminence in sacred knowledge (brahma-varcasam), as is stated in numerous passages of Vedic literature.[६९] Such distinction is not indeed confined to the Brahmin: the king has it also, but it is not really in a special manner appropriate to the Kṣatriya.[७०] Many ritual acts are specified as leading to Brahmavarcasa,[७१] but more stress is laid on the study of the sacred texts: the importance of such study is repeatedly insisted upon.[७२]
The technical name for study is Svādhyāya: the Satapatha Brāhmaṇa is eloquent upon its advantages,[७३] and it is asserted that the joy of the learned Śrotriya, or ‘student,’ is equal to the highest joy possible.[७४] Nāka Maudgalya held that study and the teaching of others were the true penance (tapas).[७५] The object was the ‘threefold knowledge’ (trayī vidyā), that of the Ṛc, Yajus, and Sāman,[७६] a student of all three Vedas being called tri-śukriya[७७] or tri-śukra,[७८] ‘thrice pure.’ Other objects of study are enumerated in the Śatapatha Brāhmaṇa,[७९] in the Taittirīya Āraṇyaka,[८०] the Chāndogya Upaniṣad,[८१] etc. (See Itihāsa, Purāṇa; Gāthā, Nārāśaṃsī; Brahmodya; Anuśāsana, Anuvyākhyāna, Anvākhyāna, Kalpa, 2. Brāhmaṇa; Vidyā, Kṣatravidyā, Devajanavidyā, Nakṣatravidyā, Bhūtavidyā, Sarpavidyā; Atharvāṅgirasaḥ, Daiva, Nidhi, Pitrya, Rāśi; Sūtra, etc.)
Directions as to the exact place and time of study are given in the Taittirīya Āraṇyaka[८२] and in the Sūtras. If study is carried on in the village, it is to be done silently (manasā); if outside, aloud (vācā).
Learning is expected even from persons not normally competent as teachers, such as the Carakas, who are recognized in the Śatapatha Brāhmaṇa[८३] as possible sources of information. Here, too, may be mentioned the cases of Brahmins learning from princes, though their absolute value is doubtful, for the priests would naturally represent their patrons as interested in their sacred science: it is thus not necessary to see in these notices any real and independent study on the part of the Kṣatriyas.[८४] Yājñavalkya learnt from Janaka,[८५] Uddālaka Āruṇi and two other Brahmins from Pravāhaṇa Jaivali,[८६] Dṛptabālāki Gārgya from Ajātaśatru,[८७] and five Brahmins under the lead of Aruṇa from Aśvapati Kaikeya.[८८] A few notices show the real educators of thought: wandering scholars went through the country[८९] and engaged in disputes and discussions in which a prize was staked by the disputants.[९०] Moreover, kings like Janaka offered rewards to the most learned of the Brahmins;[९१] Ajātaśatru was jealous of his renown, and imitated his generosity. Again, learned women are several times mentioned in the Brāhmaṇas.[९२]
A special form of disputation was the Brahmodya, for which there was a regular place at the Aśvamedha (‘horse sacrifice’)[९३] and at the Daśarātra (‘ten-day festival’).[९४] The reward of learning was the gaining of the title of Kavi or Vipra, ‘sage.’[९५]
8. The Functions of the Brahmin.--The Brahmin was required not merely to practise individual culture, but also to give others the advantage of his skill, either as a teacher or as a sacrificial priest, or as a Purohita.
As a teacher the Brahmin has, of course, the special duty of instructing his own son in both study and sacrificial ritual.[९६] The texts give examples of this, such as Āruṇi and Śvetaketu,[९७] or mythically Varuṇa and Bhṛgu.[९८] This fact also appears from some of the names in the Vaṃśa Brāhmaṇa[९९] of the Sāmaveda and the Vaṃśa (list of teachers) of the Śāṅkhāyana Āraṇyaka.[१००] On the other hand, these Vaṃśas and the Vaṃśas of the Śatapatha Brāhmaṇa show that a father often preferred to let his son study under a famous teacher. The relation of pupil and teacher is described under Brahmacarya. A teacher might take several pupils,[१०१] and he was bound to teach them with all his heart and soul.[१०२] He was bound to reveal everything to his pupil, at any rate to one who was staying with him for a year (saṃvatsara-vāsin),[१०३] an expression which shows, as was natural, that a pupil might easily change teachers. But, nevertheless, certain cases of learning kept secret and only revealed to special persons are enumerated.[१०४] The exact times and modes of teaching are elaborately laid down in the Sūtras,[१०५] but not in the earlier texts.
As priest the Brahmin operated in all the greater sacrifices; the simple domestic (gṛhya) rites could normally be performed without his help, but not the more important rites (śrauta). The number varied: the ritual literature requires sixteen priests to be employed at the greatest sacrifices (see Ṛtvij), but other rites could be accomplished with four,[१०६] five,[१०७] six,[१०८] seven,[१०९] or ten[११०] priests. Again, the Kauṣītakins[१११] had a seventeenth priest beside the usual sixteen, the Sadasya, so called because he watched the performance from the Sadas, ‘seat.’ In one rite, the Sattra (‘sacrificial session’) of the serpents, the Pañcaviṃśa Brāhmaṇa,[११२] adds three more to the sixteen, a second Unnetṛ, an Abhigara, and an Apagara. The later ritual places the Brahman at the head of all the priests, but this is probably not the early view (see Brahman).
The sacrifice ensured, if properly performed, primarily the advantages of the sacrificer (yajamāna),[११३] but the priest shared in the profit, besides securing the Dakṣiṇās. Disputes between sacrificers and the priests were not rare, as in the case of Viśvantara and the Śyāparṇas,[११४] or Janamejaya and the Asitamṛgas;[११५] and the Aiṣāvīras are referred to as undersirable priests.[११६] Moreover, Viśvāmitra once held the post of Purohita to Sudās, but gave place to Vasiṣṭha.
The position of Purohita differed considerably from that of the ordinary priest, for the Purohita not merely might officiate at the sacrifice, but was the officiator in all the private sacrifices of his king. Hence he could, and undoubtedly sometimes did, obtain great influence over his master in matters of secular importance; and the power of the priesthood in political as opposed to domestic and religious matters, no doubt rested on the Purohita.
There is no recognition in Vedic literature of the rule later prevailing by which, after spending part of his life as a Brahmacārin, and part as a householder, the Brahmin became an ascetic[११७] (later divided into the two stages of Vānaprastha, ‘forest-dweller,’ and Saṃnyāsin, ‘mystic’). Yājñavalkya's case[११८] shows that study of the Absolute might empty life of all its content for the sage, and drive him to abandon wife and family. In Buddhist times the same phenomenon is seen[११९] applying to other than Brahmins. The Buddhist texts are here confirmed in some degree by the Greek authorities.[१२०] The practice bears a certain resemblance to the habit of kings, in the Epic tradition,[१२१] of retiring to the forest when active life is over.
From the Greek authorities[१२२] it also appears--what is certainly the case in the Buddhist literature[१२३] --that Brahmins practised the most diverse occupations. It is difficult to say how far this was true for the Vedic period. The analogy of the Druids[१२४] --in some respects very close--suggests that the Brahmins may have been mainly confined to their professional tasks, including all the learned professions such as astronomy[१२५] and so forth. This is not contradicted by any Vedic evidence, for instance, the poet of a hymn of the Rigveda[१२६] says he is a poet, his father a physician (Bhiṣaj), and his mother a grinder of corn (Upala-prakṣiṇī). This would seem to show that a Brahmin could be a doctor, while his wife would perform the ordinary household duties. So a Purohita could perhaps take the field to assist the king by prayer, as Viśvāmitra,[१२७] and later on Vasiṣṭha[१२८] do, but this does not show that priests normally fought. Nor do they seem normally to have been agriculturists or merchants. On the other hand, they kept cattle: a Brahmacārin's duty was to watch his master's cattle.[१२९] It is therefore needless to suppose that they could not, and did not, on occasion turn to agricultural or mercantile pursuits, as they certainly did later. But it must be remembered that in all probability there was more purity of blood, and less pressure of life, among the Brahmins of the Vedic age than later in Buddhist times, when the Vedic sacrificial apparatus was falling into grave disrepute.
It is clear that the Brahmins, whatever their defects, represented the intellectual side of Vedic life, and that the Kṣatriyas, if they played a part in that life, did so only in a secondary degree, and to a minor extent. It is natural to suppose that the Brahmins also composed ballads, the precursors of the epic; for though none such have survived, a few stanzas of this character, celebrating the generosity of patrons, have been preserved by being embedded in priestly compositions. A legend in the Śatapatha Brāhmaṇa[१३०] shows clearly that the Brahmins regarded civilization as being spread by them only: Kosala and Videha, no doubt settled by Āryan tribes, are only rendered civilized and habitable by the influence of pious Brahmins. We need not doubt that the non-Brahminical tribes (see Vrātya) had attained intellectual as well as material civilization, but it is reasonable to assume that their civilization was inferior to that of the Brahmins, for the history of Hinduism is the conquest by the Brahmins--not by arms, but by mind--of the tribes Āryan and non-Āryan originally beyond the pale.
2. Brāhmaṇa, ‘religious explanation,’[१३१] is the title of a class of books which as such are only mentioned in the Nirukta[१३२] and the Taittirīya Āraṇyaka,[१३३] and then in the Sūtras, where the names of the Brāhmaṇas occur, showing that literary works were in existence.
3. Brāhmaṇa is taken by Roth in the St. Petersburg Dictionary[१३४] to mean the ‘Soma cup of the Brahman’ in two passages of the Rigveda[१३५] and one of the Atharvaveda.[१३६]
Vedic Rituals Hindi सम्पाद्यताम्

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ब्राह्मण पु.
(ब्रह्मन् + अण्) हिन्दुओं के प्रथम वर्ग का नाम, उस यजमान का नामकरण जो दीक्षित हो चुका है, ‘अन्यो दीक्षितोऽयं ब्राह्मण इत्याह त्रिरुच्चैः’, का.श्रौ.सू. (यद्यपि मूल रूप से वह ब्राह्मणेतर जाति का हो सकता है, जैसे वैश्य अथवा राजन्य), द्रष्टव्य 7.4.12 (ब्राह्मण इत्वेव वैश्यराजन्य-योरपि श्रुतेः); न. उन कृतियों का वर्ग जो ब्रह्मभाग ब्राह्मण वेदों का भाग होते हुए भी संहिता एवं उपनिषदों से इतर के रूप में निरूपित है। सायण के अनुसार, ब्राह्मण के दो भाग हैं ः (i) विधि (यज्ञों के सम्बन्ध में नियम एवं निर्देश); (ii) अर्थवाद (व्याख्यात्मक टिप्पणी ः प्रशंसा अथवा निन्दा), भट्ट भास्कर मिश्र के अनुसार ‘ब्राह्मणं नाम कर्मणस्तन्मात्राणां व्याख्यानग्रन्थः’, तै.सं.भा. 1.5.1; ‘शेषे ब्राह्मण शब्दः’ मी.सू. 2.1.6०; सभी वेदों के अपने ब्राह्मण ग्रन्थ हैं।
↑ i. 164, 45;
vi. 75, 10;
vii. 103, 1. 7. 8;
x. 16, 6;
71, 8. 9;
88, 19;
90, 12;
97, 22;
109, 4. See Muir, Sanskrit Texts, 12, 251-257;
Roth, Nirukta, Erläuterungen, 126;
St. Petersburg Dictionary, s.v., where Rv. viii. 58, 1, is added;
Ludwig, Translation of the Rigveda, 3, 220-226.
↑ ii. 6, 3;
iv. 6, 1;
v. 17, 9;
18, 1 et seq.;
19, 2 et seq.;
xi. 1, 28;
xix. 34, 6;
35, 2, etc.
↑ Taittirīya Saṃhitā, i. 6, 7, 2;
ii. 1, 2, 8, etc.;
Vājasaneyi Saṃhitā, vii. 46. etc.
↑ x. 90.
↑ Cf. Oldenberg, Zeitschrift der Deutschen Morgenländischen Gesellschaft, 42, 235;
Geldner, Vedische Studien, 2, 146, n. 1;
and see Varṇa.
↑ See Maitrāyaṇī Saṃhitā, iv. 3, 8;
Kāṭhaka Saṃhitā, xxix. 10;
Vājasaneyi Saṃhitā, xxi. 21;
Śatapatha Brāhmaṇa, v. 4, 4, 15;
xiii. 1, 9, 1;
3, 7, 8;
Aitareya Brāhmaṇa, vii. 15;
viii. 9;
Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, ii. 8, 2;
xi. 11;
9;
xv. 6, 3;
and cf. Brahmapurohita;
Weber, Indische Studien, 10, 27 et seq.
↑ See Maitrāyaṇī Saṃhitā, ii. 1, 7;
iii. 3, 10;
Taittirīya Saṃhitā, ii. 2, 11, 2, etc.
↑ Maitrāyaṇī Saṃhitā, iii. 3, 10.
↑ Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, i. 4, 23 (Mādhyaṃdina = i. 4, 11 Kāṇva). Cf. Kāṭhaka Saṃhitā, xxviii. 5;
Śatapatha Brāhmaṇa, i. 2, 3, 2;
v. 4, 2, 7. Contrast the claim that Soma alone is King of the Brahmins, Vājasaneyi Saṃhitā, x. 18;
Śatapatha Brāhmaṇa, v. 4, 2, 3.
↑ See Taittirīya Saṃhitā, v. 1, 10, 3;
Kāṭhaka Saṃhitā, xix. 10;
xxvii. 4;
xxix. 10;
Maitrāyaṇī Saṃhitā, ii. 2, 3;
7, 7;
iii. 1, 9;
2, 3;
iv. 3, 9;
Vājasaneyi Saṃhitā, xx. 25;
Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, xix. 17, 4;
Śatapatha Brāhmaṇa, iv. 1, 4, 6;
v. 4, 4, 15;
Aitareya Brāhmaṇa, viii. 10. 17, 24, 25, etc. Cf. Purohita.
↑ Maitrāyaṇī Saṃhitā, i. 8, 7;
Pañcavimśa Brāhmaṇa, xviii. 10, 8;
Av. v. 1719;
Taittirīya Brāhmaṇa, i. 7, 2, 6;
Śatapatha Brāhmaṇa, xiii. 1, 5, 4.
↑ Av. v. 3, 2;
vi. 13, 1;
44, 2;
xix. 62, 1 (compared with xix. 32, 8), and probably v. 11, 11;
Taittirīya Saṃhitā, i. 7, 3, 1;
ii. 5, 9, 6;
Kāṭhaka Saṃhitā, viii. 13;
Maitrāyaṇī Saṃhitā, i. 4, 6;
Śatapatha Brāhmaṇa, ii. 2, 2, 6;
4, 3, 14;
iii. 1, 1, 11;
iv. 3, 4, 4. See Weber, op. cit., 10, 35, 36;
von Schroeder, Indiens Literatur und Cultur, 146, 147.
↑ Neither in i. 139, 7, nor ix. 99, 6 (see Roth, St. Petersburg Dictionary, (s.v. deva), is this sense at all probable. Zimmer, Altindisches Leben, 206, quotes 1, 128, 8, but that also is uncertain.
↑ vii. 29, 2. Cf. Varṇa. n. 71.
↑ Weber, Indische Studien, 9, 326.
↑ Muir, Sanskrit Texts, 5, 439.
↑ xi. 5, 7, 1 et seq. See Weber, op. cit., 10, 41 et seq.
↑ E.g., Kāṭhaka Saṃhitā;
xxv. 3;
Taittirīya Brāhmaṇa, i. 1, 10, 6;
Satapatha Brāhmaṇa, ii. 4, 1, 10;
3, 4, 6, etc.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, xiv. 6, 1, 2.
↑ Kāṭhaka Saṃhitā, xix. 12.
↑ vi. 5, 8;
Kāṭhaka Saṃhitā, xxvii. 2.
↑ Kāṭhaka Saṃhitā, xiv. 5;
Taittirīya Brāhmaṇa, i. 3, 2, 6, 7.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, iii. 5, 1, 25. Cf. also Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, iii. 15, 8;
Śatapatha Brāhmaṇa, xiii. 4, 3, 14, etc.
↑ xiii. 7, 12.
↑ ix. 58, 3.
↑ Taittirīya Saṃhitā, ii. 3, 12, 1. 2;
Kāṭhaka Saṃhitā, xii. 6, etc.
↑ xiii. 5, 4, 29;
6, 2, 18;
7, 1, 13.
↑ Ibid., v. 4, 2, 3.
↑ Ibid., xiii. 4, 2, 17.
↑ Taittirīya Saṃhitā, ii. 5, 11, 9.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, xii. 7, 2, 2;
Aitareya Brāhmaṇa, vii. 29. Cf. Kāṭhaka Saṃhitā, xi. 5;
Vājasaneyi Saṃhitā, ix. 40;
x. 18, etc.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, xii. 8, 1,--5.
↑ Ibid., xii. 9, 1, 1.
↑ Ibid., 1, 2, 3, 9;
vii. 5, 2, 37;
Aitareya Brāhmaṇa, ii. 8.
↑ Satapatha Brāhmaṇa, ii. 3, 1, 39;
5, 3, 16, etc. On the food of the Brahmins, cf. also Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, x. 4, 5;
xvii. 1, 9;
Aitareya Brāhmaṇa, iv. 11.
↑ Cf. Śatapatha Brāhmaṇa, iv. 1, 5, 8-14, where the Aśvins, who are famous as physicians (viii. 2, 1, 3;
xii. 7, 1, 11). are treated as impure.
↑ Taittirīya Saṃhitā, vi. 4, 9, 3. Contrast Rv. x. 97, 22, where no discredit attaches to the profession.
↑ Av. v. 17.
↑ Ibid., v. 18.
↑ ii. 6, 10. 2.
↑ xiii. 3, 5, 3.
↑ Kāṭhaka Saṃhitā, xxxi. 7;
Kapiṣṭhala Saṃhitā, xlvii. 7;
Taittirīya Brāhmaṇa, iii. 2, 8, 12.
↑ Taittirīya Saṃhitā, vi. 5, 10, 2;
Kāṭhaka Saṃhitā, xxvii. 9;
Weber, Indische Studien, 9, 481;
10, 66.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, xiii. 3, 1, 1;
5, 4, 1 et seq.
↑ x. 38.
↑ Śāṅkhāyana Śrauta Sūtra, xvi. 10, 10;
12, 16-20;
Weber, Zeitschrift der Deutschen Morgenländischen Gesellschaft, 18, 268, 269.
↑ Aitareya Brāhmaṇa, vii. 15;
Sāṅkhāyana Śrauta Sūtra, xv. 20.
↑ Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, xiv. 6, 8.
↑ See Taittirīya Saṃhitā, vi. 6, 1, 4;
Vājasaneyi Saṃhitā, vii. 46;
Taittirīya Brāhmaṇa, i. 4, 4, 2;
Śatapatha Brāhmaṇa, iv. 3, 4, 19;
xii. 4, 4, 6.
↑ Taittirīya Saṃhitā, vi. 6, 1, 4;
Kāṭhaka Saṃhitā, xxx. 1;
Maitrāyaṇī Saṃhitā, iv. 8, 1.
↑ Chāndogya Upaniṣad, vi. 4, 4.
↑ xi. 5, 4, 1;
and cf. a citation in the scholiast on Kātyāyana Śrauta Sūtra, i. 6, 14;
‘Whoever studies the Stomabhāgas (a peculiarity of the Vasiṣṭhas) is a Vasiṣṭha’;
Weber, Indische Studien, 10, 73.
↑ Aitareya Brāhmaṇa, ii. 19;
Kauṣītaki Brāhmaṇa, xii. 3;
Weber, op. cit., 2, 311.
↑ Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, xiv. 6, 6.
↑ Taittirīya Saṃhitā, vi. 2, 6, 4;
Kāṭhaka Saṃhitā, xxv. 3;
Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, xxiii. 4, 2.
↑ See Weber, op. cit., 9, 321;
10, 8. 81;
Max Müller. Ancient Sanskrit Literature, 380 et seq.
↑ Cf., e.g., Taittirīya Saṃhitā, ii. 1, 5, 5;
Kāṭhaka Saṃhitā, xiii. 5.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, v. 4, 5, 4;
Weber, op. cit., 10, 85-88.
↑ Weber, 10, 88-96;
Max Müller, Ancient Sanskrit Literature, 407 et seq.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa. ii. 3, 2, 12.
↑ Ibid., ii. 3, 4, 6.
↑ Ibid., xiii. 1, 5, 6.
↑ Ibid., iii. 2, 1, 24. Cf. iv. 1, 3, 17;
Nirukta, xiii. 9;
Kāṭhaka Saṃhitā, xiv. 5;
xxxvii. 2;
Vājasaneyi Saṃhitā, xxiii. 62.
↑ Aitareya Brāhmaṇa, vii. 27;
Muir, Sanskrit Texts, 12, 438.
↑ Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, iii. 8, 8;
v. 1, 1.
↑ Ibid., iii. 4, 1;
iv. 4, 26.
↑ Ibid., vi. 4, 4.
↑ Taittirīya Āraṇyaka, ii. 18, etc.
↑ Taittirīya Saṃhitā, iv. 1, 7, 1;
vii. 5, 18, 1;
Kāṭhaka Saṃhitā, Aśvamedha, v. 14;
Vājasaneyi Saṃhitā, xxii. 22;
xxvii. 2;
Taittirīya Brāhmaṇa, iii. 8, 13, 1;
Aitareya Brāhmaṇa, iv. 11, 6-9;
Śatapatha Brāhmaṇa, xiii. 2, 6, 10;
x. 3, 5, 16;
xi. 4, 4, 1;
Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, vi. 3, 5.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, ii. 1, 3, 6;
xiii. 1, 5, 3, 5;
2, 6, 9.
↑ Kāṭhaka Saṃhitā, xxxvii. 7;
Taittirīya Brāhmaṇa, ii. 7, 1, 1;
Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, xxiii. 7, 3, etc.;
Śatapatha Brāhmaṇa, ii. 3, 1, 31, etc.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, i. 7, 2, 3;
xi. 3, 3, 3-6;
5, 7, 10.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, xi. 5, 6, 3, 9;
7, 1;
Taittirīya Āraṇyaka, ii. 13.
↑ Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, iv. 3, 35-39;
Taittirīya Āraṇyaka, ix. 8.
↑ Ibid., vii. 8. 10.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, i. 1, 4, 2. 3;
ii. 6, 4, 2-7;
iv. 6, 7, 1, 2;
v. 5, 5, 9;
vi. 3, 1, 10. 11. 20;
x. 5, 2, 1. 2;
xi. 5, 4, 18;
xii. 3, 3, 2, etc.
↑ Kāṭhaka Saṃhitā, xxxvii. 7.
↑ Taittirīya Brāhmaṇa, ii. 7, 1, 2.
↑ xi. 5, 7, 5-8.
↑ ii. 9. 10.
↑ vii. 1, 2, 4;
2, 1;
7, 1.
↑ ii. 11. 12-15.
↑ iv. 2, 4. 1.
↑ Cf. (1) Kṣatriya and (2) Varṇa.
↑ Satapatha Brāhmaṇa, xi. 6, 2, 5.
↑ Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, vi. 1, 11;
Chāndogya Upaniṣad, v. 3, 1, and i. 8, 1. Cf. Muir, Sanskrit Texts, 5. 436, 514-516.
↑ Bṛhadāraṇyaka Upanisad, ii. 1, 1;
Kauṣītaki Upaniṣad, iv. 1.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, x. 6, 1, 2.
↑ Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, iii. 3, 1. Cf. iii. 7, 1.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, xi. 4, 1, 1.
↑ Ibid., xi. 6, 3, 1;
Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, vi. 1, 1-9, 20. 29.
↑ Aitareya Brāhmaṇa, v. 29;
Kauṣītaki Brāhmaṇa, ii. 9;
Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, iii. 3, 1;
7, 1. Cf. Āśvalāyana Gṛhya Sūtra, iii. 4, 4;
Sāṅkhāyana Gṛhya Sūtra, iv. 10.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, xiii. 5, 2, 11.
↑ Ibid., iv. 6, 9, 20.
↑ Taittirīya Saṃhitā, ii. 5, 9, 1;
Taittirīya Brāhmaṇa, iii. 5, 3, 1;
Śatapatha Brāhmaṇa, i. 4, 2. 7;
iii. 5, 3, 12. Cf. also Bṛhadāraṇyaka Upanisad, vi. 4, 29.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, i. 6, 2, 4.
↑ Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, vi. 1, 1. (Mādhyaṃdina = vi. 2, 1 Kāṇva).
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, xi. 6, 1, 1.
↑ Indische Studien, 4, 376.
↑ xv. 1.
↑ Taittirīya Āraṇyaka, vii. 3.
↑ See Taittirīya Āraṇyaka, vii. 4 (Indische Studien, 2, 211).
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, xiv. 1, 1, 26. 27. Cf. Aitareya Āraṇyaka, v. 3, 3.
↑ So the Vasiṣṭhas and the Stomabhāgas, Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, xv. 5, 24;
Taittirīya Brāhmaṇa, iii. 5, 2, 1;
Kāṭhaka Saṃhitā, xxxvii. 17;
Pravāhaṇa Jaivali and his knowledge of Brahman, Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, vi. 1, 11;
Chāndogya Upaniṣad, v. 3, where the claim is made that the praśāsana belongs to the Kṣatriyas. Śaṅkara, in his commentary, takes the word to mean the ‘giving of instruction,’ but this must be regarded as improbable, ‘rule’ being more probably the sense. Cf. Weber, Indische Studien, 10, 128;
Bo7htlingk, Translation of the Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, iii. 8, 9.
↑ Rigveda Prātiśākhya, xv. 1 et seq.;
Aitareya Āraṇyaka, v. 3, 3;
and see Weber, op. cit., 10, 129-135.
↑ Taittirīya Brāhmaṇa, ii. 3, 6, 1-4;
Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, xxv. 4, 2. The four are the Hotṛ, Adhvaryu, Agnīdh, and Upavaktṛ: Weber, 10, 139, n. 4.
↑ Kāṭhaka Saṃhitā, ix. 13;
Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, xxv. 4, 2, with a second Adhvaryu, as well as the four enumerated in the previous note.
↑ Kāṭhaka Saṃhitā, ix. 13;
Taittirīya Brāhmaṇa, ii. 2, 2, 3;
Taittirīya Āraṇyaka, iii. 4, 6;
Satapatha Brāhmaṇa, xi. 7, 2, 6, where the list has Adhvaryu, Hotṛ, Brahman, with the Pratiprasthātṛ, Maitrāvaruṇa, Āgnīdhra.
↑ Kāṭhaka Saṃhitā, ix. 13;
Taittirīya Brāhmaṇa, ii. 2, 2, 5;
Taittirīya Āraṇyaka, iii. 5;
Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, xxv. 4, 2. The number seems to be made up of the five of note 107 and the Abhigarau--i.e., probably the Abhigara and the Apagara.
↑ Kāṭhaka Saṃhita, ix. 8, 13-16;
Taittirīya Brāhmaṇa, ii. 2, 4, 1;
3, 6, 4;
Taittirīya Āraṇyaka, iii. 1;
Aitareya Brāhmaṇa, v. 25;
Pañcaviṃśa Brāhmaṇa, xxv. 4, 2. What ten are meant is uncertain;
the four of note 106 are enumerated.
↑ Cf. Śatapatha Brāhmaṇa, x. 4, 2, 19;
Keith, Aitareya Āraṇyaka, 37.
↑ xxv. 14, 3.
↑ Śatapatha Brāhmaṇa, i. 6, 1, 20;
9, 1, 12;
ii. 2, 2, 7;
iii. 4, 2, 15;
iv. 2, 5, 9, 10;
viii. 5, 3, 8;
ix. 5, 2, 16;
xii. 8, 1, 17, etc.
↑ Aitareya Brāhmaṇa, vii. 27 et seq.;
Muir, Sanskrit Texts, 5, 436 et seq.
↑ Aitareya Brāhmaṇa, vii. 27.
↑ Cf. Śatapatha Brāhmaṇa, xi. 2, 7, 32, where Weber, Indische Studien, 10, 153, n. 1, interprets Aiṣāvīra, not as a proper name, but as meaning ‘contemptible’;
but Sāyaṇa thinks a proper name is meant, a view accepted by Eggeling, Sacred Books of the East, 44, 45, n. 2.
↑ See Deussen, Philosophy of the Upanishads, 372 et seq.
↑ Bṛhadāraṇyaka Upaniṣad, ii. 4, 1;
iv. 5, 1. See iii. 5, 1, for his teaching, of which his action is a logical consequence.
↑ Fick, Die sociale Gliederung, 40 et seq.;
Oldenberg, Buddha,^5 72 et seq.
↑ Arrian, Indica, xii. 8. 9;
Strabo, xv. 1, 49, 60.
↑ Hopkins, Journal of the American Oriental Society, 13, 179 et seq.
↑ See Fick, loc. cit.
↑ Rhys Davids, Buddhist India, 57.
↑ Cæsar, Bellum Gallicum, vi. 14. The Druids did not fight, did not pay tribute, studied for many years, observed secrecy as to matters of ritual and learning, did not use writing, and had a certain belief in transmigration. Cf. Weber, Indische Studien, 5, 19.
↑ Hence the Brahman is the 28th Nakṣatra: Taittirīya Brāhmaṇa, i. 5, 3, 3;
Weber, Naxatra, 2, 306, 311;
Indische Studien, 10, 40.
↑ ix. 112.
↑ Rv. iii. 33. 53.
↑ Rv. vii. 18.
↑ Chāndogya Upaniṣad, iv. 4, 5;
Aitareya Āraṇyaka, iii. 1, 6.
↑ i. 4, 1, 14-17. Cf. Weber, Indische Studien, 9, 257, 277, 278, and Aitareya Brāhmaṇa, iii. 44.
Almost all that can be said of the Brahmins is collected in Weber's Indische Studien, 10, 40-158. Cf. also Ludwig, Translation of the Rigveda, 3, 220-226;
Fick, Die sociale Gliederung (for Buddhist times;
the evidence is, however, of uncertain, and much of it probably of late, date);
Hopkins, Journal of the American Oriental Society, 13, 82, 182, etc. (for notices of the Brahmins in the Epic): The Mutual Relations of the Four Castes according to the Mānavadharmacāstram (for the Dharma view). Muir, Sanskrit Texts, 12, 248 et seq., discusses the priesthood in the Rigveda, and Zimmer, Altindisches Leben, 197212, gives an excellent summary of the facts.
↑ Aitareya Brāhmaṇa, i. 25, 15;
iii. 45, 8;
vi. 25, 1, etc.;
Taittirīya Saṃhitā, iii. 1, 9, 5;
5, 2, 1;
Śatapatha Brāhmaṇa, iii. 2, 4, 1, etc. In the Kauṣītaki Brāhmaṇa and the Śāṅkhāyana Āraṇyaka, i. and ii., the use is constant.
↑ ii. 16;
xiii. 7.
↑ ii. 10.
↑ Cf. Muir, Sanskrit Texts, 12, 253, n. 26.
↑ i. 15, 5;
ii. 36, 5.
↑ xx. 2, 3.
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कग्यु (Kagyu) या कग्युद (तिब्बती: བཀའ་བརྒྱུད) तिब्बती बौद्ध धर्म के छह मुख्य सम्प्रदायों में से एक है। अन्य पाँच न्यिंगमा, सक्या, जोनंग, गेलुग और बोन हैं। इनमें से सक्या, गेलुग और कग्यु को वज्रयान का नवप्रसार (New Transmission) या सारमा (གསར་མ) कहा जाता है, क्योंकि यह तिब्बत में बौद्ध धर्म के फैलाव की द्वितीय शृंख्ला में उत्पन्न हुए। न्यिंगमा, सक्या और कग्यु लाल टोपी सम्प्रदाय हैं क्योंकि औपचारिक समारोहों पर इनके अनुयायी लाल रंग की टोपियाँ पहनते हैं। कग्यु को गुरु-शिष्य परम्परा और गुरु से शिष्य को व्यक्तिगत सीख देने के लिए जाना जाता है। बहुत से प्रभावशाली कग्यु गुरुओं और उनके द्वारा स्थापित शाखाओं के कारण इतिहास में कग्यु सम्प्रदाय के कई उपसम्प्रदाय बनते चले गए।[1][2]
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प्राचीन काल से चले आ रहे नाथ संप्रदाय को गुरु मच्छेंद्र नाथ और उनके शिष्य गोरखनाथ ने पहली बार व्यवस्था दी। गोरखनाथ ने इस सम्प्रदाय के बिखराव और इस सम्प्रदाय की योग विद्याओं का एकत्रीकरण किया। गुरु और शिष्य को तिब्बती बौद्ध धर्म में महासिद्धों के रूप में जाना जाता है।
परिव्रराजक का अर्थ होता है घुमक्कड़। नाथ साधु-संत दुनिया भर में भ्रमण करने के बाद उम्र के अंतिम चरण में किसी एक स्थान पर रुककर अखंड धूनी रमाते हैं या फिर हिमालय में खो जाते हैं। हाथ में चिमटा, कमंडल, कान में कुंडल, कमर में कमरबंध, जटाधारी धूनी रमाकर ध्यान करने वाले नाथ योगियों को ही अवधूत या सिद्ध कहा जाता है। ये योगी अपने गले में काली ऊन का एक जनेऊ रखते हैं जिसे 'सिले' कहते हैं। गले में एक सींग की नादी रखते हैं। इन दोनों को 'सींगी सेली' कहते हैं।
इस पंथ के साधक लोग सात्विक भाव से शिव की भक्ति में लीन रहते हैं। नाथ लोग अलख (अलक्ष) शब्द से शिव का ध्यान करते हैं। परस्पर 'आदेश' या आदीश शब्द से अभिवादन करते हैं। अलख और आदेश शब्द का अर्थ प्रणव या परम पुरुष होता है। जो नागा (दिगम्बर) है वे भभूतीधारी भी उक्त सम्प्रदाय से ही है, इन्हें हिंदी प्रांत में बाबाजी या गोसाई समाज का माना जाता है। इन्हें उदासी या वनवासी आदि सम्प्रदाय का भी माना जाता है। नाथ साधु-संत हठयोग पर विशेष बल देते हैं।
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गच्छ, श्रीपुज्य जैन आचार्य का परिवार अथवा एक श्रीपुज्य से दीक्षित यति समुदाय। प्रत्येक गच्छ की गुरु परंपरा को गच्छावली अथवा पट्टावली कहते हैं। इस समय जैन धर्म में चौरासी गच्छ जैन धर्म में ८४ गछ ही होते है जो भगवान महावीर स्वामी के समय से ही निर्धारित है और इन गच्छों का सञ्चालन यति परंपरा के आचार्य यानि की श्रीपुज्य जी करते थे। इसमें सभी गच्छों के अलग अलग श्रीपुज्य होते हैं और उनके सम्प्रदाय में दीक्षित सभी साधू 'यति' कहलाते हैं। यति परम्परा जैन धर्म में दीक्षित सबसे पुराणी परम्परा है जो भगवान ऋषभ देव स्वामी के समय से चली आरही है।जब भगवान ऋषभ देव जी को पारना करना था तब सब किसी ने उनको धन माया भेट दी मगर उन्होंने किसी से ये सब स्वीकार नहीं किया। तब श्रेणिक राजा ने उनको गन्ने के रस को बोहरा कर पारना करवाया तभी से ही यति भगवन्तो को गौचरी बोहराने की परम्परा चली आ रही। फिर भगवान महावीर स्वामी से चतुर्विध संघ का चलन हुआ जिसमे जैन साधू /यति - साध्वी/यतिनिया श्रावक/ श्राविका को एक दुसरे का पूरक मान कर संघ की स्थापना की और ८४ गच्छो का निर्माण किया। ये ८४ गच्छ सिर्फ यति सम्प्रदाय के लिए ही था लेकिन कालांतर में यति प्रथा से अलग हुए या निकले गए साधुओं ने अपने अपने नए सम्प्रदाय का निर्माण किया और इन गच्छो के नामों का उपयोग करने लगे। पूर्व में जितने भी आगम- श्लोक- पूजाएँ और ग्रन्थ लिखे गए है वे सब जो आज जैन धर्म में हम पढ़ रहे है वो यति भगवन्तो की देन है। वर्तमान में यति परम्परा में कम ही लोग इसलिए दीक्षित होते हैं क्योंकि इस परम्परा में दीक्षित होने के लिए साधना-तप-त्याग-ब्रह्मचर्य-अस्तेय-का होना जरुरी है। समय के साथ इस साधू परम्परा में कमी आई और सब इस नयी सरल परम्परा में दीक्षित होने लगे और यति परम्परा जो जैन धर्म की रक्षा करने वाली और आज के इस शुद्ध और सात्विक परम्परा की जनक परम्परा है धीरे धीरे कम हो रही है। इस परम्परा में अंतिम दीक्षित यति कुमार विजय हैं जिनकी दीक्षा गुजरात के वडोदरा के वाल्वोद गाँव में हुई है।
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संधि-विच्छेद संग्रह
पेज समस्याएं
दो वर्णों के मेल से होने वाले विकार को संधि कहते हैं। इस मिलावट को समझकर वर्णों को अलग करते हुए पदों को अलग-अलग कर देना संधि-विच्छेद है। हिंदी भाषा में संधि द्वारा संयुक्त शब्द लिखने का सामान्य चलन नहीं है। पर संस्कृत में इसके बिना काम नहीं चलता है। संस्कृत के तत्सम शब्द ग्रहण कर लेने के कारण संस्कृत व्याकरण के संधि के नियमों को हिंदी व्याकरण में भी ग्रहण कर लिया गया है। शब्द रचना में संधियाँ उसी प्रकार सहायक है जैसे उपसर्ग, प्रत्यय, समास आदि।
यहाँ वर्णक्रम से संधि तथा उसके विच्छेद संग्रहित किए गए हैं। साथ ही संधि का प्रकार भी निर्देशित है।
अ, आ संपादित करें
अंतःकरण = अंतः + करण (विसर्ग-संधि)
अजंत = अच् + अंत (व्यंजन संधि)
अञ्नाश = अच् + नाश (व्यंजन संधि)
अधोगति = अधः + गति (विसर्ग-संधि)
अनुच्छेद = अनु + छेद (व्यंजन संधि)
अन्वय = अनु + अय (यण स्वर संधि)
अन्वेषण = अनु + एषण (यण स्वर संधि)
अब्ज = अप् + ज (व्यंजन संधि)
अभिषेक = अभि + सेक (व्यंजन संधि)
अम्मय = अप् + मय (व्यंजन संधि)
आच्छादन = आ + छादन (व्यंजन संधि)
अत्रैव = अत्र + एव (वृद्दि संधि)
इत्यादि = इति + आदि (यण स्वर संधि)
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निर्धन = निः + धन (विसर्ग-संधि)
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परिणाम = परि + नाम (व्यंजन संधि)
पवन = पो + अन (अयादि स्वर संधि)
पावक = पौ + अक (अयादि स्वर संधि)
पित्राज्ञा = पितृ + आज्ञा (यण स्वर संधि)
प्रमाण = प्र + मान (व्यंजन संधि)
ब, भ, म संपादित करें
भगवद्भक्ति = भगवत् + भक्ति (व्यंजन संधि)
भानूदय = भानु + उदय (दीर्घ स्वर सन्धि)
भूर्ध्व = भू + ऊर्ध्व (दीर्घ स्वर सन्धि)
मतैक्य = मत + ऐक्य (वृद्धि स्वर संधि)
मनोनुकूल = मनः + अनुकूल (विसर्ग-संधि)
मनोबल = मनः + बल (विसर्ग-संधि)
महर्षि = महा + ऋषि (गुण स्वर सन्धि)
महींद्र = मही + इंद्र (दीर्घ स्वर सन्धि)
महीश = मही + ईश (दीर्घ स्वर सन्धि)
महेंद्र = महा + इंद्र (गुण स्वर सन्धि)
महेश = महा + ईश (गुण स्वर सन्धि)
महैश्वर्य = महा + ऐश्वर्य (वृद्धि स्वर संधि)
महोत्सव = महा + उत्सव (गुण स्वर सन्धि)
महोर्मि = महा + ऊर्मि (गुण स्वर सन्धि)
महौषध = महा + औषध (वृद्धि स्वर संधि)
महौषधि = महा + औषध (वृद्धि स्वर संधि)
मुनींद्र = मुनि + इंद्र (दीर्घ स्वर सन्धि)
मुनीश = मुनि + ईश (दीर्घ स्वर सन्धि)
य, र, ल, व संपादित करें
यद्यपि = यदि + अपि (यण स्वर संधि)
रवींद्र = रवि + इंद्र (दीर्घ स्वर सन्धि)
लघूर्मि = लघु + ऊर्मि (दीर्घ स्वर सन्धि)
वधूत्सव = वधू + उत्सव (दीर्घ स्वर सन्धि)
वधूर्जा = वधू + ऊर्जा (दीर्घ स्वर सन्धि)
वधूल्लेख = वधू + उल्लेख (दीर्घ स्वर सन्धि)
वनौषधि = वन + ओषधि (वृद्धि स्वर संधि)
वागीश = वाक + ईश (व्यंजन संधि)
वाड़्मय = वाक + मय (व्यंजन संधि)
विद्यार्थी = विद्या + अर्थी (दीर्घ स्वर सन्धि)
विद्यालय = विद्या + आलय (दीर्घ स्वर सन्धि)
विधूदय = विधु + उदय (दीर्घ स्वर सन्धि)
विषम = वि + सम (व्यंजन संधि)
श, ष, स, ह संपादित करें
षडानन = षट् + आनन (व्यंजन संधि)
षण्मास = षट् + मास (व्यंजन संधि)
संकल्प = सम् + कल्प (व्यंजन संधि)
संचय = सम् + चय (व्यंजन संधि)
संतोष = सम् + तोष (व्यंजन संधि)
संधिच्छेद = संधि + छेद (व्यंजन संधि)
संपूर्ण = सम् + पूर्ण (व्यंजन संधि)
संबंध = सम् + बंध (व्यंजन संधि)
संयोग = सम् + योग (व्यंजन संधि)
संरक्षण = सम् + रक्षण (व्यंजन संधि)
संलग्न = सम् + लग्न (व्यंजन संधि)
संवाद = सम् + वाद (व्यंजन संधि)
संविधान = सम् + विधान (व्यंजन संधि)
संशय = सम् + शय (व्यंजन संधि)
संसार = सम् + सार (व्यंजन संधि)
सच्छास्त्र = सत् + शास्त्र (व्यंजन संधि)
सज्जन = सत् + जन (व्यंजन संधि)
सदैव = सदा + एव (वृद्धि स्वर संधि)
सद्धर्म = सत् + धर्म (व्यंजन संधि)
सद्भावना = सत् + भावना (व्यंजन संधि)
सम्मति = सम् + मति (व्यंजन संधि)
सम्मान = सम् + मान (व्यंजन संधि)
सिंधूर्मि = सिधु + ऊर्मि (दीर्घ स्वर सन्धि)
स्वच्छंद = स्व + छंद (व्यंजन संधि)
स्वागत = सु + आगत (यण स्वर संधि)
हिमालय = हिम + आलय (दीर्घ स्वर सन्धि)
क्ष, त्र, ज्ञ संपादित करें
ज्ञानोपदेश = ज्ञान + उपदेश (गुण स्वर सन्धि)
इन्हें भी देखें संपादित करें
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🔵 हम बदलेंगे - युग बदलेगा, हम सुधरेंगे - युग सुधरेगा
Aaj Ka Sadchintan (आज का सद्चिंतन)हमारी वसीयत और विरासतसुनसान के सहचरअमृतवाणीKahaniyan (कहानियां)Aadhyatam (अध्यात्म)Prernadayak Prasang (प्रेरणादायक प्रसंग)सतयुग की वापसी Aatmchintan Ke Kshan (आत्मचिंतन के क्षण) गायत्री और यज्ञ विचार क्रांतिगायत्री विषयक शंका समाधानहमारी युग निर्माण योजना Jivan Jine Ki Kla (जीवन जीने की कला)संस्मरण जो भुलाए न जा सकेंगेअन्य
शुक्रवार, 30 सितंबर 2016
👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 44)

अपने उपदेशों को चालू रखते हुये गुरुदेव ने कहा:
🔵 तिल तिल कर मैं तुम्हारे व्यक्तित्व पर अधिकार करूँगा। पग पग चलकर तुम मेरे निकटतर आते जाओगे क्योंकि मैं ही तुम्हारा प्रभु और ईश्वर हूँ। तथा मैं तुम्हारे और मेरे मध्य इन्द्रियभोग रूपी देवताओं या तत्संबंधी विचारों को सहन नहीं करूँगा। वत्स! पर्दो को चीर डालो।
🔴 तब मैं जान पाया कि गुरुदेव ने ही मेरा दायित्व लें लिया है। मेरे मस्तक पर से एक बहुत बड़ा बोझ उतर गया। उन्होंने पुन:कहा:-
🔵 इन्द्रियातीत अनुभूतियाँ अच्छी हैं, किन्तु चरित्र द्वारा उत्पन्न होने वाली चेतना इन्द्रियातीत अनुभूति से कहीं अधिक श्रेष्ठ हैं। चरित्र ही सब कुछ हैं तथा चरित्र त्याग से ही बनता है। दुःख तथा आघात हमारी आत्मा की शक्ति को प्रगट कर हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं। उनका स्वागत करो। ये जिन दैवी अवसरों का निर्माण करते हैं उन्हें देखो।
🔴 जैसी की -कहावत है, हीरा हीरे को काटता है- उसी प्रकार दुःख ही पाशविक प्रवृत्तियों को जीतता है। धन्य है दुःख! महाभक्तिमति कुन्ती ने प्रभु से प्रार्थना की थी, कि उसके भाग में सदा दु:ख ही पड़ते रहें जिससे कि वह सदैव प्रभु का स्मरण करती रह सके। वत्स! उसकी प्रार्थना ही सच्ची प्रर्थना थी तुम भी उसी प्रकार प्रार्थना करो। यदि तुम मुझसे प्रेम करते हो तो यह जान लो कि दुःख तुम्हें मेरे ओर अधिक निकट लायेगा तथा तुम्हारा श्रेष्ठ व्यक्तित्व प्रगट हो उठेगा।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर
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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 1 Oct 2016

🔴 उन्नति, विकास एवं प्रगति करना प्रत्येक व्यक्ति का परम पावन कर्त्तव्य है। यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो उसके जीवन में जड़ताजन्य अनेक दोष आ जायेंगे, जो इस प्रसन्न मानव जीवन को एक यातना में बदल देंगे। निराशा, चिंता, क्षोभ, ईर्ष्या, द्वेष आदि अवगुण प्रगति शून्य जड़ जीवन के ही फल हुआ करते हैं।
🔵 जहाँ वाचालता एक दुर्गुण है, वहां मौन एक रहना दैवी गुण है जिसका अपने में विकास करना ही चाहिए, किन्तु इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि मनुष्य बिलकुल बात ही न करे। मौन रहने का मूल मन्तव्य यह है कि जितना आवश्यक हो उतना ही बोला जाये। अनावश्यक वार्तालाप न करना अथवा यों ही निरर्थक दिन भर हा-हा, हू-हू न करते रहना भी मौन ही है।
🔴 जीवन विकास के लिए यह जरूरी है कि प्रत्येक व्यक्ति अपनी विशिष्टता को बढ़ाकर ऐसा विकास करे कि वह अपना, आश्रित परिजनों का जीवन उत्कृष्ट श्रेणी का बनाता हुआ मानवीय उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अग्रसर होता चले। इस जीवन की शान्ति ही पारलौकिक शान्ति है, इस जीवन का संतोष ही पारलौकिक संतोष है। इस जीवन का सुख ही पारलौकिक सुख है। इसलिए स्वर्ग पाना है तो इसी जीवन को स्वर्ग बना लो।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 जो दीपक की तरह जलने को तैयार हों (भाग 1)

🔴 महाप्रभु ईसा अपने शिष्यों से कहते थे- “तुम मुझे प्रभु कहते हो- मुझे प्यार करते हो, मुझे श्रेष्ठ मानते हो और मेरे लिए सब कुछ समर्पण करना चाहते हो। सो ठीक है। परमार्थ बुद्धि से जो कुछ भी किया जाता है, जिस किसी के लिए भी किया जाता है वह लौटकर उस करने वाले के पास ही पहुँचता है। तुम्हारी यह आकाँक्षा वस्तुतः अपने आपको प्यार करने, श्रेष्ठ मानने और आत्मा के सामने आत्म समर्पण करने के रूप में ही विकसित होगी। दर्पण में सुन्दर छवि देखने की प्रसन्नता- वस्तुतः अपनी ही सुसज्जा की अभिव्यक्ति है।
🔵 दूसरों के सामने अपनी श्रेष्ठता प्रकट करना उसी के लिए सम्भव है जो भीतर से श्रेष्ठ है। प्रभु की राह पर बढ़ाया गया हर कदम अपनी आत्मिक प्रगति के लिए किया गया प्रयास ही है। जो कुछ औरों के लिए किया जाता है वस्तुतः वह अपने लिए किया हुआ कर्म ही है। दूसरों के साथ अन्याय करना अपने साथ ही अन्याय करना है। हम अपने अतिरिक्त और कोई को नहीं ठग सकते। दूसरों के प्रति असज्जनता बरतकर अपने आपके साथ ही दुष्ट दुर्व्यवहार किया जाता है।”
🔴 “दूसरों को प्रसन्न करना अपने आपको प्रसन्न करने का ही क्रिया-कलाप है। गेंद को उछालना अपनी माँस-पेशियों को बलिष्ठ बनाने के अतिरिक्त और क्या है? गेंद को उछालकर हम उस पर कोई एहसान नहीं करते। इसके बिना उसका कुछ हर्ज नहीं होगा। यदि खेलना बन्द कर दिया जाये तो उन क्रीड़ा उपकरणों की क्या क्षति हो सकती है? अपने को ही बलिष्ठता के आनन्द से वंचित रहना पड़ेगा।”
🔵 “ईश्वर रूठा हुआ नहीं है कि उसे मनाने की मनुहार करनी पड़े। रूठा तो अपना स्वभाव और कर्म है। मनाना उसी को चाहिए। अपने आपसे ही प्रार्थना करें कि कुचाल छोड़े। मन को मना लिया- आत्मा को उठा लिया तो समझना चाहिए ईश्वर की प्रार्थना सफल हो गई और उसका अनुग्रह उपलब्ध हो गया।”
🌹 शेष कल
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1986 फरवरी पृष्ठ 2
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 1 Oct 2016

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 1 Oct 2016

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👉 मां की महिमा (प्रेरणादायक प्रसंग)

मां की महिमा जानने के लिए एक आदमी स्वामी विवेकानंद के पास आया। इसके लिए स्वामी जी ने आदमी से कहा, ''5 किलो का एक पत्थर कपड़े में लपेटकर पेट पर बांध लो और 24 घंटे बाद मेरे पास आना, तुम्हारे हर सवाल का उत्तर दूंगा।'' दिनभर पत्थर बांधकर वह आदमी घूमता रहा, थक-हारकर स्वामी जी के पास पंहुचा और बोला- मैं इस पत्थर का बोझ ज्यादा देर तक सहन नहीं कर सकता हूं।
स्वामी जी मुस्कुराते हुए बोले, ''पेट पर बंधे इस पत्थर का बोझ तुमसे सहन नहीं होता। एक मां अपने पेट में पलने वाले बच्चे को पूरे नौ महीने तक ढ़ोती है और घर का सारा काम भी करती है। दूसरी घटना में स्वामी जी शिकागो धर्म संसद से लौटे तो जहाज से उतरते ही रेत से लिपटकर रोने गले थे। वह भारत की धरती को अपनी मां समझते थे और लिपटकर खूब रोए थे।
सीख- संसार में मां के सिवा कोई इतना धैर्यवान और सहनशील नहीं है। इसलिए मां से बढ़ कर इस दुनिया में कोई और नहीं है।
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गुरुवार, 29 सितंबर 2016
👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 43)

🔵 सभी प्रवृत्तियों में संन्यास की प्रवृत्ति सर्वश्रेष्ठ है। स्वयं को सभी बंधनों से मुक्त करके तुम उन सबकी- सहायता करते हो जो तुम्हें जानते हैं या जो तुम्हारे- जीवन में आयेंगे। आत्म- साक्षात्कार के द्वारा संन्यासी सभी कर्तव्यों को पूर्ण कर लेता है। उसके आत्मत्याग से दूसरे भी मुक्त हो जाते हैं। अपने हृदय और कर्मों में संन्यासी बनो। किसी व्यक्ति या वस्तु पर निर्भर न रहो। दूसरों को उनकी स्वतंत्रता दो तथा तुम स्वयं भी मुक्त रहो। अपनी असुविधाओं के कारण निराश न होओ क्योंकि वही असुविधायें यदि आध्यात्मिक दिशा की ओर मोड़ दी जाएँ तो सुविधाओं में परिवर्तित हो जायेंगी।
🔴 अपनी भावनाओं का अध्यात्मीकरण करो। और जब तुम्हारे स्वभाव में कोई दुर्भावना या स्नायविक- उत्तेजना न रहेगी तब तुम अपने आधार पर खड़े हो सकोगे तथा अनेकों के लिए ज्योति और सहायक होओगे, भले ही तुमने उन लोगों को देखा भी न हो। सिंह के समान बनो, तब सभी दुर्बलताएँ तुमसे दूर हो जायेंगी। ईश्वर बनने की इच्छा करो तब तुम्हारी देहात्मबुद्धि दू रहो जायेगी। तुम शुद्धात्मा हो जाओगे। प्रकृति के भव्य दृश्यों पर्वतों, विशाल समुद्रों तथा चमकते सूर्य से शिक्षा ग्रहण करो। शक्तिशाली व्यक्तित्व से एकत्व बोध करो।
🔵 वत्स! -स्वयं का निर्माण करना एक लम्बी तथा कष्टप्रद प्रक्रिया है। तुम उन्नत हो सको इसके पूर्व यह आवश्यक है कि तुम स्वयं के प्रति अत्यन्त निष्कपट बनो। अपने प्रति छूट या दया के सभी पर्दों को लगातार दु:ख तथा अपने क्षुद्र अंह की सीमा के अनुभव द्वारा चीर डालना होगा। ईश्वर के साथ अज्ञान तथा तुम्हारी आत्मा के साथ छद्म नहीं हो सकता। सूक्ष्म तथा सर्वश्रेष्ठ अवश्य प्रगट होगा। अत: दुःख के प्रत्येक वाहक के प्रति कृतज्ञ रहो जो कि एक साथ तुम्हें और तुम्हारी दुर्बलता को तुम्हारे सामने प्रगट कर देता है। कहो, दुःख तुम धन्य हो!
🔴 अल्पविद्या ने तुम्हें बुद्धिमान, अहंवादी बना दिया है। महत् विद्या तुम्हें आध्यात्मिक बना देगी। स्मरण रखो मन आत्मा नहीं है। अनुभवों मन को कुचल डालने दो, जैसा कि वह करेगा। यह उसे शुद्ध करेगा यही मुख्य बात है। क्रमश: आत्मा का सूर्य अज्ञान के काले बादलों को भेद देगा और तब लक्ष्य तुम्हारे सामने स्पष्ट हो जायेगा। तुम उसकी ज्योति में मिल जाओगे।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर
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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 30 Sep 2016

🔴 अंतःकरण में पापकर्म के संकल्प का उदय होते ही आत्मा में एक बेचैनी पैदा होने लगती है। उसका विवेक बार-बार धिक्कारता और भर्त्सना करता है। मनुष्य सुख-चैन की नींद खो देता है। उसकी अंतरात्मा बार-बार पुकार करती है कि तेरा यह संकल्प, यह विचार, यह भावना उचित नहीं, इनकी पूर्ति तेरे लिए अकल्याणकर परिस्थितियाँ पैदा करेंगी, पाप कर्म के लिए मनुष्य का यह आदि अंतर्द्वन्द्व कितना दुःखद, कष्टकर तथा मानसिक क्षय करने वाला होता है, इसको तो कोई भुक्त भोगी ही बतला सकता है।
🔵 भलाई के कार्यों में कुछ कमी है तो उतनी कि उसके परिपाक में कुछ समय लगता है। शुभ कर्म का फल समय के गर्भ में जब तक पक नहीं जाता, तब तक उसकी धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। कम स्वादिष्ट, कम उपयोगी फलों के वृक्ष एक वर्ष में ही काफी बड़े हो जाते हैं, किन्तु स्वादिष्ट आम धीरे-धीरे बढ़ता है, काफी समय के बाद फूलता और फल देता है। शुभ कर्मों के फल भी विलम्ब से प्राप्त होते हैं, किन्तु उनसे प्राप्त होने वाले आनंद में आम के फल की तरह कोई संदेह नहीं होता।
🔴 किसी भी विशिष्ट व्यक्ति, वस्तु अथवा स्थान का देखना अथवा दिव्यता का दर्शन करना तभी सार्थक होता है, जब उसके गुणों अथवा विशेषताओं को सूक्ष्मता से देखें, उनकी महत्ता को समझें, हृदयंगम करें और जीवन विकास के लिए उनसे प्रेरणा एवं शिक्षा ग्रहण करें अन्यथा उथला एवं दृग दर्शन कौतूहल तृप्ति के अतिरिक्त अधिक लाभ न कर सकेगा।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
Posted by AWGP Shantikunj Haridwar at 7:20:00 pm
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👉 विद्या से विनय- Vidhya Se Vinay

🔵 महर्षि आरुणि के पुत्र श्वेतकेतु ने गुरुकुल में रहकर लगन के साथ विद्याध्ययन किया। साथ ही गुरु-सेवा से उनके कृपा पात्र भी बन गये। यद्यपि गुरु को अपने सभी शिष्य प्रिय थे तथापि अपने सेवा बल से श्वेतकेतु ने विशेषता प्राप्त करली थी। गुरु सेवा की कृपा से जहाँ उन्होंने शीघ्र ही चारों वेदों का अखण्ड ज्ञान प्राप्त कर लिया था। वहाँ गुरु की प्रशंसा और प्रियता के कारण उनमें कुछ अहंकार भी आ गया था। अपने पाण्डित्य के अभिमान में गुरु के सिवाय अन्य किसी का आदर करना ही भूल गये।
🔴 निदान श्वेतकेतु जब गुरु का आशीर्वाद और चारों वेदों का सम्पूर्ण ज्ञान लेकर घर आये तो अहंकारवश पिता को भी प्रणाम नहीं किया। उनके पिता महर्षि आरुणि को इसका बड़ा दुःख हुआ। दुःख इसलिये नहीं कि वे पुत्र के प्रणाम के भूखे थे और श्वेतुकेतु ने उन्हें प्रणाम नहीं किया। वरन् दुःख इसलिये हुआ कि पुत्र एक लम्बी अवधि के बाद जहाँ ज्ञानी वहाँ अभिमानी भी होकर आया है।
🔵 महर्षि आरुणि पुत्र की इस वृत्ति से चिन्तित हो उठे। क्योंकि वे जानते थे कि जिस विद्या के साथ विनय नहीं रहती वह न तो फलीभूत होती है और न आगे विकसित! उन्होंने पुत्र के हित में उसका यह विकार दूर करने के मन्तव्य से व्यंगपूर्वक कहा— “ऋषिवर ! आपने ऐसी कौन ज्ञान की गूढ़ पुस्तक पढ़ ली है जो गुरुजनों का आदर तक करना भूल गये। मानता हूँ आप बहुत बड़े विद्वान हो गये। चारों वेदों का ज्ञान आपने प्राप्त कर लिया है। किन्तु इसके साथ यह भी जानते होंगे कि विद्या का सच्चा स्वरूप विनय है। जब आप वही न सीख पाये विद्वान कैसे?
🔴 पिता की बात सुन कर श्वेतकेतु ने अपनी भूल अनुभव की और लज्जित होकर पिता के चरणों में गिर गये। महर्षि आरुणि ने श्वेतकेतु को उठाकर छाती से लगा लिया और कहा—”अभिमान तुम्हें नहीं, अपने पुत्र की विद्वता पर अभिमान तो मुझे होना चाहिये था।”
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 30 Sep 2016

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 30 Sep 2016

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बुधवार, 28 सितंबर 2016
👉 समाधि के सोपान Samadhi Ke Sopan (भाग 42)

🔵 ध्यान की घड़ियों में मुझे सम्बोधित करनेवाली वाणी मैंने सुनी:- हृदय में कटुता न रखो। स्वयं के साथ निष्कपट बनो। स्वयं के संबंध में सभी भ्राँत धारणाओं को उखाड़ फेंको। सभी मिथ्यासक्तियों को निर्मूल कर दो। शरीर के स्थान पर चैतन्य को देखो। दूसरे तुम्हें जैसा देखते हैं स्वयं को उसी प्रकार देखो। सर्वोपरि स्वयं पर मिथ्यानुकम्पा न करो। दृढ़ बनो। यदि तुममें भूले हैं तो वे एक सिंह की भूलों के समान हों।
🔴 विधि का विधान शक्तिशाली है। तुम्हारी स्वयं की इच्छा के अनुपात में वह तुम्हारे हृदय का मर्दन करेगा तथा व्यक्तित्व को झकझोर देगा। किन्तु वह तुम्हें सच्चे आत्मज्ञान की ओर भी ले जायेगा। अत: अपने विश्वास को विधान पर आधारित करो। क्रिया से प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है। अत: तुम्हारी क्रियाओं को हृदय की पवित्रता तथा विचारों से आने दो। तब तुम शांति का अनुभव करोगे। भावना के नाम पर प्राय: बहुत से दोष ही ढके जाते है। उनकी जड़ों में स्थूल शारीरिक मूल प्रवृत्तियाँ ही क्रियाशील होती हैं। उन्हें सोने की चादर से ढक देने से कोई अंतर नहीं पड़ता।
🔵 व्यक्ति में विशुद्ध शारीरिक संवेगों को उच्च भावों के आदर्श के रूप में प्रस्तुत करने की प्रवृति होती है। किन्तु विवेक इस छद्म को चीर देता है तथा यह सिखाता है कि मिथ्या आसक्ति सदैव आत्मकेन्द्रित, निरंकुश, क्रूर और विवेकहीन होती है। वह स्वेच्छाचारी, अंधा, तथा शरीरासक्त होता है। इसके विपरीत विशुद्ध प्रेम आत्मा से संबंधित होता है। प्रेमास्पद को असीम स्वतंत्रता देता है तथा आत्मत्याग और विवेक से परिपूर्ण होता है। अत: अपने हृदय से आसक्ति और अनुचित भावों को निकाल फेंको और एक बार यह कर लेने पर जैसे तुम अपनी वमन की हुई वस्तु को घृणास्पद होने के कारण पुन: नहीं देखना चाहते उसी प्रकार उन आसक्तियों के विषय में न सोचो। वह बंधन है, भयानक बंधन। इसे स्मरण रखो तथा मुक्ति के लक्ष्य की ओर वीरतापूर्वक बढ़ चलो।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर
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👉 आत्मचिंतन के क्षण Aatmchintan Ke Kshan 29 Sep 2016

🔴 विचार क्रान्ति-जिसका अर्थ है मनुष्य की आस्था के स्तर को निकृष्टता से विरत कर उत्कृष्टता की ओर अभिमुख करना, आज की यह सबसे बड़ी आवश्यकता है। युग की यही पुकार है। संसार का उज्ज्वल भविष्य इसी प्रक्रिया द्वारा संभव है। इतने आवश्यक एवं महत्त्वपूर्ण प्रयोजन की पूर्ति के लिए हर प्रबुद्ध व्यक्ति को कुछ सोचना ही होगा, अन्यमनस्क बैठे रहने से तो हम अपनी आत्मा के सामने कर्त्तव्यघात के अपराधी ही ठहरेंगे।
🔵 यदि आप महत्त्वाकाँक्षी हैं, जीवन में उन्नति एवं विकास का कोई ऊँचा लक्ष्य पाना चाहते हैं, तो प्रगति पथ के इन तीन शत्रुओं-आवेश, असहनशीलता तथा अदूरदर्शिता को निकाल डालिये और प्रतिक्षण सावधान रह कर श्रेय पथ पर आगे बढ़िये। आपकी आकाँक्षाएँ सफल होंगी। आपका उद्योग, उद्यम तथा परिश्रम और पुरुषार्थ फल जाएगा।
🔴 प्रभु समदर्शी है। वह सबका पिता है। उसे अपने सभी पुत्र समान रूप से प्यारे हैं। वह किसी के बीच भेदभाव नहीं बरतता। सबको समान दृष्टि से देखता है और सब पर समान कृपा रखता है। उसे पक्षपाती कहना उसकी महिमा, गरिमा और उसके ऐश्वर्य के प्रति धृष्टता करना है। अपने सुख-दुःख और अच्छी-बुरी परिस्थितियों का कारण मनुष्य स्वयं है, परमात्मा अथवा अन्य कोई व्यक्ति, शक्ति अथवा वस्तु नहीं।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 खरे व्यक्तित्व की कसौटी (अन्तिम भाग)

🔵 व्यक्तित्ववानों की परख का एक और भी तरीका है कि उनने अपने सगे सम्बन्धियों के साथ न्यायोचित व्यवहार का निर्वाह किया या नहीं। जिनके साथ निरन्तर रहना पड़ता है उन्हीं के साथ आदमी की असलियत खुलती है। बाहर के लोगों के साथ तो बनावटी सज्जनता भी दिखाई जा सकती है, पर मुखौटा पहनकर दिनचर्या का निर्वाह नहीं हो सकता। चकमे में डालने की कला कभी-कभी ही काम देती है और वह प्रायः अजनबी लोगों पर ही सफल होती है। जिनसे लगातार वास्ता पड़ता है उनसे किसी के स्वभाव या चरित्र की वस्तुस्थिति छिपी नहीं रहती।
🔴 व्यक्तित्ववानों को सदा अपनी गरिमा का ध्यान रहता है। स्वाभिमान गँवाने वाले कामों में वे हाथ नहीं डालते। ऐसी दशा में चतुर लोग उनसे उदास रहते हैं और घनिष्ठता स्थापित नहीं करते। किसकी घनिष्ठता किन से है, यह देखकर सहज ही जाना जा सकता है कि इस व्यक्ति का स्तर क्या होना चाहिए? इसी प्रकार यदि पिछले दिनों के कार्यों पर दृष्टि डाली जाय और यह देखा जाय कि वे किस स्तर के थे तो भी समझा जा सकता है कि इसका व्यक्तित्व क्या है। इस स्तर की प्रतिभा अर्जित करने के लिए उच्चस्तरीय स्वाध्याय सत्संग आवश्यक है। जिसे बाहरी स्थिति ऐसी मिलेगी वही चिन्तन और मनन भी ऊंचे स्तर का कर सकेगा। उसके द्वारा अन्यान्यों को भी ऊंचे स्तर का परामर्श एवं सहयोग मिलेगा। इन्हीं कसौटियों पर कसकर यह देखा जा सकता है कि किसका व्यक्तित्व किस स्तर का है।
🔵 व्यक्तित्व सच्चे अर्थों में मनुष्य की महती और चिरस्थायी सम्पदा है। इसी के सहारे वह अपना और दूसरों का भला कर सकता है। किन्हीं पर उपयोगी प्रभाव डालने में भी ऐसे ही लोग सफल होते हैं। अन्यथा जिनकी कथनी और करनी में अन्तर होता है। वे सर्वत्र सन्देह की दृष्टि से देखे जाते हैं और पोल खुलने पर उपहासास्पद बनते हैं।
🔴 ऊंचे उठने, सफल बनने एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने के लिए जिस सौभाग्य को सराहा जाता है वह वस्तुतः खरा व्यक्तित्व ही है। सोने की जब कसौटी और अँगीठी पर परख हो जाती है तो उसकी उपयुक्त कीमत मिलती है। यही बात व्यक्तित्व के सम्बन्ध में भी वह जब खरा होने की स्थिति तक पहुँच जाता है तो मनुष्य को ऐसा सौभाग्यशाली बनाता है। जिसकी चिरकाल तक सराहना होती रहे।
🌹 समाप्त
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1986 अप्रैल पृष्ठ 26
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1986/April.25
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👉 गुरु की तलाश

एक थे सेठ। वे गुरु की तलाश में थे। पर चाहते ऐसा थे, जो पहुँचा हुआ हो, ज्ञानी हो। बहुतों को जाँचा परखा पर कोई खरा न निकला। तलाश का अन्त न हुआ।
सेठानी ने कहा- ‘यह काम मेरे ऊपर छोड़ दें। जो मिला करे उसे मेरे पास भेज दिया करें। सेठ जी सहमत हो गये। एक झंझट टला।’
सेठानी ने पिंजड़े में एक कौआ पाला। जो भी महात्मा आया, उनसे यही कहतीं, देखिए मेरा पाला कबूतर अच्छा है न?
सन्त लोग आते। कबूतर कहाँ है? कैसा है? कहते। जब सेठानी अपनी बात पर अड़ी ही रहतीं, तो वे क्रोध में भरकर उलटी-सीधी बातें कहते और वापस चले जाते।
यही क्रम चलता रहा। बहुतेरे आये और सभी चले गये। कोई खरा उतरा नहीं। जो आवेश ग्रस्त हो चले, वे सन्त कैसे? जो सन्त नहीं वह गुरु योग्य कहाँ?
एक दिन एक वयोवृद्ध सन्त आये। सत्कार करने के उपरान्त सेठानी ने वही कौआ-कबूतर का सिलसिला चला दिया।
यह सन्त आवेश में नहीं आये। कौए और कबूतर का अन्तर समझाते रहे। न समझ पाने पर इतना ही कहकर चले गये- बेटे, हठ मत करना। तथ्य का पता लगाना। कोई सर्वज्ञ नहीं। हमसे आपसे भूल हो सकती है। सत्य को समझने के लिए मन के द्वार खुले रखने चाहिए। वे हँसते हुए चल दिये। क्रोध था न आवेश न मानापमान का भाव।
सेठानी ने सन्त को द्वार से वापस लौटा लिया। नमन किया और कहा- “जैसा चाहती थी, वैसा आपको पाया। कृपया हमारे परिवार के गुरु का उत्तरदायित्व ग्रहण करें।”
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👉 प्रेरणादायक प्रसंग Prernadayak Prasang 29 Sep 2016

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👉 आज का सद्चिंतन Aaj Ka Sadchintan 29 Sep 2016

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मंगलवार, 27 सितंबर 2016
👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 28 Sep 2016

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👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 28 Sep 2016

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👉 Samadhi Ke Sopan समाधि के सोपान (भाग 41)

🔵 सहिष्णुता बढ़ाओ। तुम पूरी तरह अनुत्तरदायी तथा आक्रमक हो। इसके पूर्व कि तुम दूसरों के दोष देखो तथा निर्ममता पूर्वक उनकी आलोचना करो, अपनी भंयकर भूलों को देखो। यदि तुम अपनी जीभ पर लगाम नहीं लगा सकते तो उसे तुम्हारे ही विरुद्ध बकने दो, दूसरों के विरुद्ध नहीं। पहले अपना घर सम्हालो। ये शिक्षायें आत्मसाक्षात्कार के सर्वोच्च दर्शन के अनुकूल ही हैं। क्योंकि चरित्र के बिना आत्म -साक्षात्कार हो ही नहीं सकता। नम्रता, निरहंकारिता, सज्जनता, सहनशीलता, दूसरों के दोष न देखना, ये सब गुण आत्मसाक्षात्कार के व्यवहारिक तथ्य हैं। दूसरे तुम्हारे साथ क्या करते हैं इस ओर ध्यान न दो। अपने आत्मविकास में लगे रहो। जब तुमने यह सीख लिया तब एक बहुत बड़े रहस्य को जान लिया।
🔴 अहंकार ही सबके मूल में है। अहंकार को उखाड़ फेंको। वासना के संबंध में सतत सावधान रही। जब तक शरीर चिता पर न चढ़ जाय तब तक पूर्णत: इन्द्रियजित होने का निश्चय नहीं हो सकता। यदि तुम इसी जीवन में मुक्त होना चाहते हो तो अपने हृदय को श्मशान बना कर अपनी सारी इच्छाओं को उसमें भस्म कर दो। अंध आज्ञाकारिता सीखो। तुम एक बच्चे के अतिरिक्त और क्या हो ? क्या हो वास्तविक ज्ञान है ? जैसे बच्चे को ले जाया जाता है उसी प्रकार तुम भी स्वयं को ले जाया जाने दो। स्वयं को मेरी इच्छा के प्रति पूर्णत: समर्पित कर दो। क्या मैं प्रेम में तुम्हारी माँ के समान नहीं हूँ ? और फिर मैं तुम्हारे पिता के समान भी हूँ क्योंकि मैं तुम्हें दण्ड भी देता हूँ। यदि तुम गुरु होना चाहते हो तो सर्वप्रथम शिष्य होना सीखो। तुम्हें अनुशासन की आवश्यकता है।
🔵 पहले मेरे कार्य के लिए तुम्हारा उत्साह बचकाना तथा उत्तेजना पूर्ण था। अब वह सच्ची अन्तर्दृष्टि से युक्त होता जा रहा है। बच्चा विचार- हीन होता है, युवक आकांक्षी होता है, प्रौढ़ व्यक्ति ही उपादेय होता है। मैं तुम्हें आध्यात्मिक अर्थ में प्रौढ़ बनाना चाहता हूँ। मैं तुम्हें गंभीर, दायित्वपूर्ण, निष्ठावान, सुअनुशासित तथा चरित्र की दृढ़ता और निष्ठा के द्वारा मेरे प्रति अपने प्रेम और निष्ठा को प्रगट करने वाला बनाऊँगा। बढ़ो! मेरा आशीर्वाद तथा प्रेम सदैव तुम्हारे साथ है।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर
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👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 28 Sep 2016

🔴 परिस्थितियों का निर्माण मनुष्य स्वयं करता है, न कि परिस्थितियाँ मनुष्य का निर्माण करती है। परिस्थितियों पर आश्रित रहने और उनके बदलने की प्रतीक्षा किये बिना यदि मनुष्य स्वयं उन्हीं परिस्थितियों में रहते हुए उन्हें बदलने का प्रयास करे तो कोई आश्चर्य नहीं कि उसे सफलता न मिले।
🔵 विनोद वृत्ति भीतरी खुशी का अजस्र झरना है, निरन्तर चलने वाला फव्वारा है। बाहर खुशियों की तलाश के नतीजे अनिश्चित रहते हैं। बाहरी परिस्थितियाँ सदा व्यक्ति के वश में नहीं होतीं। उत्तम मार्ग यही है कि खुशियों का स्रोत भीतर ही प्रवाहमान, गतिशील रखा जाय। बाहर खुशी ढूँढना, प्यास लगने पर कुँए या प्याऊ की तलाश करना है। कुँआ सूखा या खारे जल वाला हो सकता है। प्याऊ में पानी नहीं मिले यह भी हो सकता है, पर भीतर बहने वाला निर्मल हास्य का झरना तो तृप्ति के लिए सदा ही उपलब्ध रहता है।
🔴 हम सामाजिक प्राणी हैं। समाज से अलग हमारा कोई अस्तित्व नहीं। समाज उन्नत होगा तो हमारी भी उन्नति होगी, समाज का पतन होगा तो हमारा भी पतन होगा। हम समाज के उत्थान-पतन अथवा सफलता-असफलता से कदापि अछूते नहीं रह सकते। इस प्रकार समाज के अभिन्न अंग होकर यदि हम ईर्ष्यावश किसी का अहित करने की सोचते हैं तो सबसे पहले अपना अहित करने का उपक्रम करते हैं।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 Khare Vyaktitva Ki Kasuti खरे व्यक्तित्व की कसौटी (भाग 2)

🔴 शालीनता उपार्जित करने के लिए शिक्षा की भी जरूरत पड़ती है। अशिक्षित आमतौर से गँवार या मूर्ख होते हैं। उनके व्यवहार में दूसरों को हानि पहुँचा कर अपना लाभ कमा लेने की नीति का समावेश होता है। ऐसा ही वे स्वयं करते हैं और ऐसा ही कर गुजरने के लिए वे दूसरों को परामर्श देते हैं। कारण कि उनका ज्ञान समीप वर्ती, साधारण लोगों तक ही सीमित होता है और औसत आदमी सफल बनने के लिए ऐसे ही तरीके अपनाता है। उनमें से अपवाद रूप में ही भलमन साहत पाई जाती है। जिस पर इस समुदाय का प्रभाव है वे यही समझते हैं कि दुनिया का रीति-रिवाज यही है और इसी रीति-नीति को अपनाने में कोई हर्ज नहीं है।
🔵 सुशिक्षित-स्वाध्यायशील व्यक्तियों के सामने ही आदर्श वादियों की कार्य पद्धति होती है। इतिहास में ही ऐसे श्रेष्ठ पुरुष खोजे जा सकते हैं। वे कभी-कभी और कहीं-कहीं ही होते हैं। उन्हें आदर पूर्वक पढ़ने, सुनने और समझने में ही इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि कितने ही लोगों ने प्रत्यक्ष घाटा उठाते हुए भी आदर्शों का परिपालन किया है और सर्व साधारण के सामने अनुकरणीय पथ प्रदर्शन प्रस्तुत किया है। ऐसे लोग यदि भावनाशील हुए और आदर्शों को अपनाने से किस प्रकार महान बना जा सकता है यह समझ सके तो फिर अपने को ढाँचे में ढालता है और समय-समय पर दूसरों को भी वैसी ही सलाह देते हैं। इसी परख पर यह जाना जा सकता है कि यह व्यक्तित्ववान है या नहीं। उसकी शालीनता परिपक्व स्तर की है या नहीं।
🔴 व्यक्तित्ववान दूसरों का विश्वास अर्जित करते हैं, साथ ही सम्मान एवं सहयोग भी। ऐसे लोगों को बड़े उत्तरदायित्व सौंपे जाते हैं और वे उन्हें उठाने में प्रसन्न भी होते हैं। क्योंकि महत्वपूर्ण कार्यों को सम्पन्न करने में अनेक लोगों का विश्वास और सहयोग अर्जित करने में ऐसे ही लोग सफल होते हैं। निश्चित है कि महत्वपूर्ण कामों को पूरा करने में सद्गुणी साथी अनिवार्य रूप से आवश्यक होते हैं और वे हर किसी का साथ नहीं देते। कारण कि उन्हें यह देखना पड़ता है कि कहीं ओछे लोगों की मंडली में शामिल होकर हमें भी बदनामी न ओढ़नी पड़े।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1986 अप्रैल पृष्ठ 25
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👉 Samadhi Ke Sopan समाधि के सोपान (भाग 40)

मेरी आत्मा में श्रीगुरुदेव की वाणी ने कहा -
🔵 वत्स! स्वयं तुम्हारे विकास के इतिहास से अधिक रुचिकर और कुछ नहीं है। व्यक्तित्व का विकास ही जीवन को रुचिपूर्ण बनाता है। साक्षी बनो। एक ओर खड़े हो जाओ तथा अपने व्यक्तित्व का इस प्रकार निरीक्षण करो मानों वह तुमसे भिन्न कोई वस्तु हो। अपने स्वेच्छाचारी विचारों तथा चंचल इच्छाओं का निरीक्षण करो। गत कल की अनुभूतियों का कितना क्षणिक महत्व है। आगामी दस वर्षों में भी क्या आना जाना है?
🔴 इस बात का विचार कर जीवन में अविचल रहो। जो कुछ भी सांसारिक है उसका कुछ भी महत्व नहीं है। वह चला जायेगा। इसलिये आत्मिक वस्तु में ही समय लगाओ। अनासक्त बनो। ध्यान में डूब जाओ। तुम्हारी वृत्ति साधुओं की सी हो। किसी भी अनुभव या विचार का महत्व चरित्र निर्माण की उसकी प्रवृत्ति पर ही निर्भर करता है। इस बातका अनुभव कर जीवन का एक नया दृष्टिकोण प्राप्त करो।
🔵 संसारी लोग क्षणभंगुर मिट्टी के लोंदे, अपने इस शरीर के लिए कितना समय देते है। उनका मन इन क्षणभंगुर वस्तुओं के लिए कितना चिन्तित रहता है। वे लोग इन नाशवान वस्तुओं के साथ ही नष्ट हो जाते हैं। वे सब माया से ग्रस्त हैं। अत: संसारी वस्तुओं की चिन्ता में न पड़ो। संसारी लोगों का संग त्याग दो। मन कितना सूक्ष्म है। वह सदैव भौतिक वस्तुओं को आदर्शान्वित करने की ही चेष्टा करता है। यही माया का जादू है। ऊपर से दिखने वाले तड़क भड़क तथा मिथ्या सौंदर्य से मोहित न होओ।
🔴 अन्तर्दृष्टि न खोओ। अनादिकाल से यह संघर्ष चल रहा है। तुम्हारी आत्मा के प्रति ईश्वर का जो प्रेम है उसकी तुलना में संसारासक्ति क्या है? आसक्ति शरीर के प्रति होती है इसलिए बंधन है। किन्तु तुम मुझे अपनी आत्मा से प्रेम करते हो वही अंतर है। वत्स! संसार को भयानकता तथा मिथ्यात्व का बोध करने के लिए तुम कठिन पीड़ा से होकर निकलो, यह दोष नहीं है। तुम जितना अधिक कष्ट पाते हो उतने ही मेरे निकट आते हो।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर
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👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 27 Sep 2016

🔴 ‘पूजा करना-मंशा पूरी कराना’ यह बात प्रलोभन भर है, तथ्यपूर्ण नहीं। ईश्वर को हमें अपनी मर्जी पर चलाने में तभी सफलता मिल सकती है, जब हम पहले उसकी मर्जी पर चलना सीखें। प्रलोभन और प्रशंसा की कीमत पर भगवान् जैसी दिव्य चेतना को फुसलाकर अपना उल्लू सीधा करने में न आज तक किसी को सफलता मिली है और न भविष्य में किसी को मिलेगी।
🔵 समाज की हर अच्छाई-बुराई, उत्थान-पतन को भगवान् की इच्छा मानने वालों को या तो इस ज्ञान का अभाव रहा करता है कि परमात्मा की इच्छा में विकृति नहीं होती। वह सदा शुद्ध एवं प्रबुद्ध है, अस्तु उसकी इच्छाएँ भी शुद्ध, प्रबुद्ध ही होती हैं। निर्विकार परमात्मा की इच्छा में विकार का क्या प्रयोजन? अथवा वे वाक् चतुर ऐसे व्यक्ति होते हैं जो अपनी अकर्मण्यता अथवा उदासीनता की आलोचना का विषय बनने से बचने के लिए आत्यन्तिक आस्तिकता का अनुचित सहारा लिया करते हैं।
🔴 जिस दिन संसार से धर्म को सर्वथा मिटा दिया जाएगा, जिस दिन लोग आत्मा-परमात्मा, लोक-परलोक को मानना सर्वथा छोड़ देंगे, जिस दिन कर्मफल सिद्धान्त में लोगों की आस्था न रहेगी, जिस दिन परमात्मा की भक्ति द्वारा परमात्मा के गुणों को अपने भीतर धारण करने वाले धर्मात्मा लोग सर्वथा उत्पन्न होने बंद हो जाएँगे, उस दिन संसार से सच्चरित्रता उठ जाएगी।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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Labels: आत्मचिंतन के क्षण
👉 Khare Vyaktitva Ki Kasuti खरे व्यक्तित्व की कसौटी (भाग 1)

🔵 व्यक्तित्ववान से तात्पर्य रंग रूप की सुन्दरता, कपड़ों की सज-धज, घुंघराले केश या साज-सज्जा के सामान से नहीं लगाया जाना चाहिए। यह विशेषताएं तो रंगमंच के नट नटियों में भी हो सकती हैं। पर इसके कारण उन्हें आकर्षक मात्र समझा जा सकता है। उन्हें व्यक्तित्ववान नहीं कहा जा सकता। ऐसे लोगों के प्रति किसी को श्रद्धा होती है न सम्मान। उन्हें कोई उत्तरदायित्वपूर्ण काम भी नहीं सौंपे जा सकते और न उनसे आशा की जा सकती है कि वे जीवन में कोई महत्वपूर्ण काम कर सकेंगे।
🔴 व्यक्तित्व से तात्पर्य शालीनता से है। जो सद्गुणों के उत्तम स्वभाव से सज्जनता से और मानवी गरिमा के अनुरूप अपनी वाणी, शैली, दिशाधारा एवं विधि-व्यवस्था अपनाने में है। यह सद्गुण स्वभाव के अंग होने चाहिए और चरित्र तथा व्यवहार में उनका समावेश गहराई तक होना चाहिए। अन्यथा दूसरों को फँसाने वाले ठग भी कुछ समय के लिए अपने को विनीत एवं सभ्य प्रदर्शित करते हैं।
🔵 कोई जब उनके जाल में फँस जाता है तो अपने असली रूप में प्रकट होते हैं। धोखे में डालकर बुरी तरह ठग लेते हैं। विश्वासघात करके उसकी बुरी तरह जेब काटते हैं। कोई आदमी वस्तुतः कैसा है इसे थोड़ी देर में नहीं समझा जा सकता। उसकी पिछली जीवनचर्या देखकर वर्तमान संगति एवं मित्र मण्डली पर दृष्टिपात करके समझा जा सकता है कि उसका चरित्र कैसा है। यह चरित्र ही व्यक्तित्व की परख का प्रधान अंग है।
🔴 इसके अतिरिक्त, शिक्षा एवं विचार पद्धति भी देखने योग्य है। कुछ समय के वार्त्तालाप में मनुष्य की शिक्षा एवं आस्था का पता चल जाता है। चिन्तन वाणी में प्रकट होता है। ठग आदर्शवादी वार्त्तालाप कर सकने में देर तक सफल नहीं हो सकते। वे किसी को जाल में फँसाने के लिए ऐसी बातें करते हैं मानों उसके हितैषी हों और उसे अनायास ही कृपा पूर्वक कोई बड़ा लाभ कराना चाहते हैं।
🔵 नीतिवान ऐसी बातें नहीं करते वे अनायास ही उदारता नहीं दिखाते और न अनुकम्पा करते हैं। न ऐसा रास्ता बताते हैं जिसमें नीति गँवाकर कमाई करने का दाँव बताया जा रहा है। व्यक्तित्ववान स्वयं नीति की रक्षा करते हैं भले ही इसमें उन्हें घाटा उठाना पड़ता हो। यही नीति उनकी दूसरों के सम्बन्ध में होती है। जब भी, जिसे भी वे परामर्श देंगे वह ऐसा होगा जिसमें चरित्र पर आँच न आती हो, भले ही सामान्य स्तर का बना रहना पड़े।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
🌹 अखण्ड ज्योति 1986 अप्रैल पृष्ठ 25
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👉 Sanyasi Kon...?? संन्यासी कौन..?

उन दिनों विवेकानन्द भारत भ्रमण के लिये निकले हुए थे! इसी क्रम में घुमते हए एक दिन हाथरस पहुँचे! भूख और थकान से उनकी विचित्र हालत हो रही थी! कुछ सस्ताने के लिये वे एक वृक्ष के नीचे निढाल हो गये!
अरुणोदय हो चुका था! उसकी सुनहरी किरणें स्वामी जी के तेजोद्दीप्त चेहरे पर पड़कर उसे और कान्तिवान बना रही थीं! इसी समय उधर से एक युवक निकला! स्वामी जी के आभावान चेहरे को देखकर ठिठका! अभी वह कुछ बोल पाता, इससे पूर्व ही उनकी आँखे खुलीं और एक मृदु हास्य बिखेर दिया! प्रत्युत्तर में युवक ने हाथ जोड़ लिये और आग्रह भरे स्वर में कहा -
"आप कुछ थके और भूखे लग रहे हैं! यदि आपत्ति न हो, तो चलकर मेरे यहाँ विश्राम करें!"
बिना कुछ कहे स्वामी जी उठ पड़े और युवक के साथ चलने के लिये राजी हो गये!
चार दिन बीत गये! नरेन्द्र अन्यत्र प्रस्थान की तैयारी करने लगे! इसी समय वह युवक उनके समक्ष उपस्थित हुआ! चल पड़ने को तैयार देख उसने पूछ लिया -
"क्या अभी इसी समय प्रस्थान करेंगे?"
"हाँ , इसी वक्त! " उत्तर मिला!
"तो फिर मुझे भी संन्यास दीक्षा देकर अपने साथ ले चलिये, मैं भी संन्यासी बनूँगा!"
स्वामी जी मुस्करा दिये! बोले - "संन्यास और संन्यासी का अर्थ जानते हो?"
जी हाँ, भलीभाँति जानता हूँ! संन्यास वह है जो मोक्ष की ओर प्रेरित करे और संन्यासी वह जो मुक्ति की इच्छा करे!
"किसकी मुक्ति?"
स्वयं की, साधक की! " तत्क्षण उत्तर मिला!
स्वामीजी खिलखिलाकर हँस पड़े! बोले - " तुम जिस संन्यास की चर्चा कर रहे हो, वह संन्यास नहीं पलायनवाद है! संन्यास न कभी ऐसा था, न आगे होने वाला है! तुम इस पवित्र आश्रम को इतना संकीर्ण न बनाओ! यह इतना महान् व शक्तिवान् है कि जब कभी इसकी आत्मा जागेगी, तो बम की तरह धमाका करेगा! तब भारत, भारत ( वर्तमान दयनीय भारत ) न रहकर, भारत ( आभायुक्त ) महाभारत, विशाल भारत बन जायेगा और एक बार पुनः समस्त विश्व इसके चरणों में गिरकर शान्ति के सन्देश की याचना करेगा! यही अटल निर्धारण है! ऐसा होने से कोई भी रोक नहीं सकता! अगले दिनों यह होकर रहेगा!
मैं स्पष्ट देख रहा हूँ की भारत के युवा संन्यासी इस मुहीम में पूर्ण निष्ठा के साथ जुट पड़े हैं और अपनी सम्पूर्ण क्षमता लगाकर इसे मूर्तिमान करने में कुछ भी कसर उठा नहीं रख रहे हैं! इनके प्रयासों से भारत की आत्मा को जगते, मैं देख रहा हूँ और देख रहा हूँ उस नवविहान को, जिसकी हम सबको लम्बे समय से प्रतीक्षा है! "
तनिक रुककर उन्होंने पुनः कहना आरम्भ लिया - " यह वही संन्यास है, जिसकी सामर्थ्य को हम विस्मृत कर चुके हैं, जिसके दायित्व को भला चुके हैं! इसका तात्पर्य आत्म-मुक्ति कदापि नहीं हो सकता! यह स्वयं में खो जाने की, अपने तक सीमित होने की प्रेरणा हमें नहीं देता, वरन् आत्मविस्तार का उपदेश करता है! यह व्यक्ति की मुक्ति का नाम नहीं, अपितु समाज की, विश्व की, समस्त मानव जाति की मुक्ति का पर्याय है! यह महान आश्रम अपने में दो महान परम्पराओं को साथ लेकर चलता है - साधु और ब्राह्मण की! साधु वह, जिसने स्वयं को साध लिया! ब्राह्मण वह, जो विराट् ब्रह्म की उपासना करता हो, उसी की स्वर्ग मुक्ति की बात सोचता हो! तुम्हारा संन्यास गुफा-कन्दराओं तक, एकान्तवास तक परिमित है किन्तु हमारा संन्यास जन-संकुलता का नाम है! "
वाणी कुछ समय के लिये रुकी, तत्पश्चात पुनः उभरी - " बोलो ! तुम्हें कौन-सा संन्यास चहिये? एकान्त वाला आत्म-मुक्ति का संन्यास या साधु-ब्राह्मणों वाला सर्व-मुक्ति का संन्यास? "
युवक स्वामीजी के चरणों में गिर पड़ा, बोला - " नहीं, नहीं मेरा आत्म-मुक्ति का मोह भंग हो चुका है! मुझे ऐसा संन्यास नहीं चहिये! मैं समाज की स्वर्ग मुक्ति के लिये काम करूँगा! देखा जाय तो समाज-मुक्ति के बिना व्यक्ति की अपनी मुक्ति सम्भव नहीं! "
युवक के इस कथन पर स्वामीजी ने सिर हिलाकर सहमति प्रकट की! एक क्षण के लिये दोनों के नेत्र मिले मानों प्राण-प्रत्यावर्तन की प्रक्रिया चल पड़ी हो! फिर उसे गुरु ने उठाकर गले से लगा लिया और कहा - " आज से शरत्चन्द्र गुप्त नहीं, स्वामी सदानन्द हुए! " गुरु-शिष्य दोनों उसी समय आगे की यात्रा पर प्रस्थान कर गये!!
मोक्ष अकेले हथियाने की वस्तु नहीं है! "मोक्ष हम सब को" यही वाक्य शुद्ध है! सब के मोक्ष का प्रयत्न करने में अपना मोक्ष भी सम्मिलित है।
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सोमवार, 26 सितंबर 2016
👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 27 Sep 2016

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Labels: प्रेरणादायक प्रसंग
👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 27 Sep 2016

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👉 Samadhi Ke Sopan समाधि के सोपान (भाग 39)

🔵 संसार मृत्यु से परिपूर्ण है। कर्म का नियम अटल है। सावधान हो जाओ। कहीं ऐसा न हो कि अशुभ कर्मों के मध्य तुम्हारी मृत्यु हो जाय! सावधान रहो, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी इन्द्रियलोलुपता तुम्हें और अधिक बंधन तथा कठिन दु:खों को उत्पन्न करने वाले कर्मजाल में फँसा दे! वत्स! एक बार अमृत का स्वाद चख लेने पर यह कैसे संभव है कि तुम असार भूसी में रस लो।
🔴 कभी आतंकित न होओ। भगवान की दया पाप के पहाड़ों से भी अधिक बड़ी है। जब तक तुम विश्वास करते हो तब तक आशा है। किन्तु यह पथ लगभग अनन्त लम्बा है। मानव व्यक्तित्व को ईश्वरचैतन्य में परिवर्तित करने में, समस्त दोषों को निर्मूल करने में कितने जीवन लगेंगे इस 'पर विचार करो। तब क्या तुम यह नहीं समझ सकते कि तुम्हें अपने कल्याण के लिए कितना परिश्रम करना पड़ेगा ? और यदि तुम मुझसे प्रेम करते हो तो क्या कम से कम मेरे लिए ही तुम लक्ष्य तक पहुँचने की चेष्टा नहीं करोगे ? तुम वीरता पूर्वक संघर्ष कर सको तथा पूर्ण हो जाओ इसके लिए मैंने इतनी लम्बी प्रतीक्षा की है। तुम्हारी साधना के लिए मैं व्याकुल रहा हूँ। मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ रहूँगा। मैं सदैव तुमसे प्रेम करूँगा किन्तु तुम्हें आलस्य को दूर करना होगा। नैतिक आलस्य से बाहर निकलो। मनुष्य बनो।
🔵 मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम तुम्हारे जीवन का ध्रुवतारा हैं। यह तुम्हारे अस्तित्व का आधार है औरे इसका कारण भी है। क्योंकि मेरे प्रति तुम्हारे प्रेम से ही तुम्हारा उद्धार होगा। गुरु के प्रति भक्ति ही एक आवश्यक वस्तु है। वह तुम्हारी सभी कठिनाइयों को दूर कर देगी। अत: प्रसन्न रही। जान रखो मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ। मेरा इर्श्वरानुराग, मेरी अनुभूति, मेरे पास जो कुछ भी है वह सब तुम्हें दे दिया जायेगा क्योंकि यदि आवश्यक हो तो शिष्य के कल्याण के लिए स्वयं को दे देने में ही गुरु का आनन्द है।
🔴 एक बार जब मैंने तुम्हें स्वीकार कर लिया हैं तब यह संबंध अनन्त काल के लिए हो गया है। जाओ और शांति से रहो। यह स्मरण रखो कि यदि तुम स्वयं के प्रति निष्ठावान हो तो तुम मेरी महिमा को बढ़ा रहे हो, यहाँ तक कि मेरे दर्शन का भी विस्तार कर रहे हो।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 एफ. जे. अलेक्जेन्डर
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👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 26 Sep 2016

🔴 ईमानदारी के साथ सद्दुदेश्य लेकर मनोयोगपूर्वक श्रम किया जाय, यह कर्त्तव्य है। कर्म करने के उपरान्त जो प्रतिफल सामने आये उससे प्रसन्न रहने का नाम संतोष है। संतोष का यह अर्थ नहीं है कि जो है उसी को पर्याप्त मान लिया जाय, अधिक प्रगति एवं सफलता के लिए प्रयत्न ही न किया जाय। ऐसा संतोष तो अकर्मण्यता का पर्यायवाचक हो जाएगा।
🔵 दृढ़ता से रहित विनम्रता नैतिक अंतर्द्वन्द्व का कारण बनती है। सही, खरी, उचित और सामान्य बात भी किसी से इस भय से न कही जाय कि कहीं उसके अहं को चोट न पहुँच जाए, कहीं वह भड़क न उठे या कि रुष्ट न हो जाए तो यह विनम्रता नहीं। भले ही इस विनम्रता के पीछे दब्बूपन न हो, पर सामाजिक नैतिकता की उपेक्षा तो है ही। अनौचित्य के विरुद्ध दृढ़ता आवश्यक है। यहाँ विनम्रता का प्रदर्शन या तो कायरता होती है या मूर्खता। कायरता पूर्ण विनम्रता का तात्पर्य है दब्बूपन और धूर्ततापूर्ण विनम्रता का अर्थ है अनैतिक जीवन।
🔴 सभ्यता का मुख्य चिह्न शिष्टाचार को माना गया है, किन्तु आज लोगों ने शिष्टाचार को शिक्षा, वस्त्रों तथा बाहरी दिखावे तक ही सीमित कर दिया है। वस्तुतः शिष्टाचार का मुख्य तत्त्व मनुष्य के हृदय में रहने वाले स्नेह, सौहार्द्र, श्रद्धा एवं सद्भावना में निहित रहता है। भारतीय मान्यता के अनुसार अंदर से शून्य रहकर बाहर से विनम्र, विनीत किन्तु अश्रद्धालु रहकर स्नेह-स्वागत, सद्भावना, सौहार्द्र अथवा आवभगत का ढंग प्र्रदर्शित करना अशिष्टाचार ही माना गया है।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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मंगलवार, 20 सितंबर 2016
👉 आत्म निर्माण की ओर (अन्तिम भाग)

🔴 यदि तुम किसी व्यक्ति द्वारा अन्य व्यक्ति की आलोचना, चुगली या तिरस्कार सुनो तो उस पर ध्यान मत दो, उसे मत मानो। वह निन्दक अपनी ही आत्महीनता का परिचय दे रहा है- उसमें स्वयं कितनी बुराइयाँ हैं उसे वह नहीं देखता और नहीं दूर करता। वह दूसरों के छिद्र देखता है- उसकी बात सुनकर उससे कहो, “मुझे आलोचना या चुगली मत सुनाओ। इससे तुम्हें या मुझे क्या लाभ ? मुझे यह बताओ कि उस व्यक्ति में अच्छे गुण क्या हैं, और वे अच्छे गुण तुम में हैं या नहीं ? तथा उसकी अपेक्षा तुम कितना अच्छा काम कर सकते हो यह सिद्ध करो।” तुम्हारी ऐसी बातें सुनकर उसकी दुबारा चुगली करने की हिम्मत नहीं होगी।
🔵 तुम भी यदि चुगली या वार्ता सुनो, दूसरों की चर्चा सुनो तो उसे दूसरों को मत सुनाओ- इससे व्यर्थ बकवाद बढ़ता है, व्यर्थ के विचार फैलते हैं, जूठा खाकर उसे उगलना कोई अच्छी बात नहीं है- यह तो कुत्तों से भी बुरा काम है। उस बात को छोड़ दो विचार करो कि क्या वह व्यक्ति सत्य कह रहा है? क्या ऐसा कह देना आवश्यक है? यदि मैं यह बात अमुक व्यक्ति को कह दूँ तो इसका क्या नतीजा होगा? इससे किसको लाभ होगा और न कह देने से किसको हानि? इन बातों में प्रेम कितना है? घृणा कितनी है? इत्यादि बातों पर विचार कर लो तब कोई सुनी हुई बात अपनी ओठों पर से दूसरे के कान में डालो फिर इसका क्या परिणाम होता है- तुम्हें पश्चाताप न होगा और दोष नहीं लगेगा, गवाही नहीं देनी होगी।
🌹 समाप्त
🌹 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/August.23
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Labels: अध्यात्म
👉 आत्म निर्माण की ओर (भाग 1) (24 Sep)

🔴 छोटी छोटी साधारण बातें बड़ी महत्त्वपूर्ण होती हैं- उनमें तत्त्वज्ञान और बड़े बड़े सत्य सिद्धान्त मिलते हैं। तुममें जितना ज्ञान है उसका उपयोग करते रहो जिससे वह नित्य नवीन बना चमकता रहेगा। केवल पुस्तकें पढ़ कर संसार की व्यावहारिक प्रथाओं में डूब जाने से ज्ञान होने से क्या लाभ जबकि अज्ञानियों के समान ही आचरण किया जाय। ज्ञानियों ने प्रथाओं की व्यवस्था मूर्खों के निर्देश के लिए ही हैं, ज्ञानी तो स्वतंत्र है और ज्ञान द्वारा विवेकबुद्धि से आचरण करने में समर्थ है यद्यपि मूर्ख लोग प्रथाबद्ध होकर ज्ञानी को धिक्कारते हैं कि उल्टा आचरण करते हो?
🔵 ज्ञानी जानता है कि तत्व सत्य क्या है अतः वह मुक्त है। अज्ञानी अभाव के कारण प्रथाओं और परम्परा को ही सत्य मान उसमें लिप्त बद्ध है। उसमें बुद्धि नहीं कि स्वतंत्र रूप से प्रथा और परम्परा से बाहर निकल कर कुछ सोच सके और कर सके। यदि तुम ज्ञानी होकर भी मूर्खों के बीच तथा और परम्परा के अनुसार आचरण करो तो तुममें और मूर्खों में क्या अन्तर रहा?
🔴 अपने ज्ञान को स्वाध्याय और छोटे छोटे व्यवहार द्वारा नित्य परिमार्जित करते रहो। यदि कहीं ज्ञान चर्चा होती हो और उसके कुछ शब्द सुनकर तुम्हें मालूम पड़े तो यह कहकर वहाँ से मत खिसक जाओ कि यह सब तो मैंने पढ़ लिया है मैं जानता हूँ। संभव है उसके अन्दर कोई नवीन बात निकल आवे जो तुम्हारे लिए उपयोगी हो, तुम्हारे जीवन में महान् परिवर्तन उपस्थित कर दे।
🔵 अपनी बात चीत में सदैव सतर्क रहो। किसी के विषय में आलोचना या निन्दा मत करो और अपने विषय में किसी प्रकार की हीनता मत प्रकट करो। संसार में सभी प्राणी- परमात्मा की कला द्वारा रचित उसकी प्रतिमूर्ति हैं दिव्य हैं, तुम भी उसकी प्रतिमूर्ति और दिव्य हो। आवश्यकता है केवल आत्म विकास की, जिससे तुम दूसरों का और अपना सत्य स्वरूप समझ सको।
🌹 क्रमशः जारी
🌹 अखण्ड ज्योति -अगस्त 1948 पृष्ठ 23
http://literature.awgp.org/magazine/AkhandjyotiHindi/1948/August.23
Posted by AWGP Shantikunj Haridwar at 1:20:00 pm
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Labels: अध्यात्म
👉 तुम बीच में खड़े हो

🔴 तुम परमात्मा की आधी शक्ति के मध्य में खड़े हो, तुमसे ऊँचे देव, सिद्ध और अवतार हैं तथा नीचे पशु-पक्षी, कीट-पतंग आदि हैं। ऊपर वाले केवल मात्र सुख ही भोग रहे हैं और नीचे वाले दु:ख ही भोग रहे हैं। तुम मनुष्य ही ऐसे हो, जो सुख और दु:ख दोनों एक साथ भोगते हो। यदि तुम चाहो तो नीचे पशु-पक्षी भी हो सकते हो और चाहो तो देव, सिद्ध, अवतार भी हो सकते हो।
🔵 यदि तुम्हें नीचे जाना है तो खाओ, पीओ और मौज करो। तुम्हें तो सुख के लिए धन चाहिए, वह चाहे न्याय से मिले या अन्याय से। नीचे आने में बाधा या कष्ट नहीं है। पहाड़ से नीचे उतरने में देर नहीं लगती। इसी तरह यदि तुम अपने भाग्य को नष्ट करना चाहो, तो कर सकते हो, परंतु पीछे तुम्हें पश्चात्ताप करना पड़ेगा। यदि तुम ऊपर जाना चाहो तो तुम्हें सत्य-मिथ्या, न्याय-अन्याय, धर्म-अधर्म के बड़े-बड़े विचार करने पडेंगे। पर्वत के ऊपर चढ़ने में कठिनाई तो है ही, परन्तु कठिनाई का फल सुख भी मिलेगा। यदि तुम कठिनाई के दु:ख को सिर पर ले लोगे, तो परम सुखी हो जाओगे।
🔴 दोनों बातें तुम्हारे लिए सही हैं, क्योंकि तुम बीच में खड़े हो, मध्य में रहने वाले आगे-पीछे अच्छी तरह देख सकते हैं, तुम ही अपने भाग्यविधाता हो, चाहे जो कर सकते हो, तुम्हारे लिए उपयुक्त और अनुकूल समय यही है, समय चूक जाने पर पश्चात्ताप ही हाथ रह जाता है।
🌹 -अखण्ड ज्योति -नवम्बर 1943
👉 You are standing in the Middle
🔵 You are standing in the middle of the cosmic layer of God’s creation. At the higher realms are the great saints, Siddhas, angels and incarnations of divine powers. Beneath your level of existence are the animals, birds, insects and lower organisms. Those above are enjoying in the divine paradise and those below are suffering in various forms. You, the human being are the only one allowed to share both the joys and the pains. You are also the only one privileged with the freedom of action to transform your fate accordingly. It’s up to you whether you
want to move your life-course downwards or upwards and destine its devolution to the lower, beastly forms or evolution to beatified, illumined states…
🔴 If you chose to decline then don’t care for anything. Just eat, rest and live for sensual joys. Earn these joys by whatever means – ethical or unethical. It’s really easy to fall down. You can spend all your stock of good omen for petty pleasures or drain it out by adopting heinous actions. But then there will be nothing but repenting and darkness…
🔵 If you want to rise high on the celestial scale of evolution of your life, you will have to distinguish between the right and the wrong, truth and false, fair and unfair, and choose the righteous path of wisdom and ideals. Climbing up on the higher mountains is harder, but then, your endeavors will lead to greater achievements in the end. If you bear hardships for adoption of high ideals, you are indeed elevating your life towards brighter ends.
🔴 You are the architect of your future destiny. Life is momentary. So don’t miss any instant of this precious opportunity. You are in the middle. You can see both ways upwards and downwards and select the future course of your life prudently.
🌹 -Akhand Jyoti, Nov. 1943
Posted by AWGP Shantikunj Haridwar at 12:36:00 pm
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Labels: विचार क्रांति
👉 प्रेम ही सर्वोपरि है

🔴 ईश्वरीय ज्ञान और नि:स्वार्थ प्रेम के अनुभव से घृणा का भाव नष्ट हो जाता है, तमाम बुराइयाँ रफूचक्कर हो जाती हैं और वह मनुष्य उस दिव्य दृष्टि को प्राप्त कर लेता है, जिसमें प्रेम, न्याय और उपकार ही सर्वोपरि दिखाई पड़ती हैं।
🔵 अपने मस्तिष्क को दृढ़ निश्चय तथा उदार भावों की खान बनाइए, अपने हृदय में पवित्रता और उदारता की योग्यता लाइए, अपनी जीभ को चुप रहने तथा सत्य और पवित्र भाषण के लिए तैयार कीजिए। पवित्रता और शक्ति प्राप्त करने का यही मार्ग है और अंत में अनंत प्रेम भी इसी तरह प्राप्त किया जा सकता है। इस प्रकार जीवन बिताने से आप दूसरों पर विश्वास जमा सकेंगे, उनको अपने अनुकूल बनाने की आवश्यकता न होगी। बिना विवाद के आप उनको सिखा सकेंगे, बिना अभिलाषा तथा चेष्टा के ही बुद्धिमान लोग आपके पास पहुँच जाएँगे, लोगों के हृदय को अनायास ही आप अपने वश में कर लेंगे। प्रेम के सबल विचार, कार्य और भाषण व्यर्थ नहीं जाते।
🔴 इस बात को भलीप्रकार जान लीजिए कि प्रेम विश्वव्यापी है, सर्वप्रधान है और हमारी हरएक जरूरत को पूरा करने की शक्ति रखता है। बुराईयों को छोड़ना, अंत:करण की अशांति को दूर भगाता है। नि:स्वार्थ प्रेम में ही शांति है, प्रसन्नता है, अमरता है और पवित्रता है।
🌹 -अखण्ड ज्योति -अक्टूबर 1943
👉 Love is Supreme
🔵 Divine knowledge and selfless love enlighten every dimension of life, destroy all vices and worries; there remains no feeling of hatred, jealously, discrimination, or fear. And then, one is blessed by the divine sight to see the pure love, justice and equality indwelling everywhere.
🔴 If you want to experience the divine joy, make your mind a source of wisdom, firm determination and noble thoughts; let your heart be an auspicious ocean of compassion. Control your tongue, purity and discipline it to speak truth. This will help your self- refinement and inner strengthening and eventually inspire the divine impulse of eternal love.
🔵 If you have integrity of character, authenticity in what you talk and do, people will believe you. You will not have to attempt convincing them. The wise and sincere seekers will themselves reach you. If in addition, you are generous and have an altruistic attitude towards everyone, you will also naturally win people’s heart. The warmth, words and works of truth and love never go in the void. Their positive impact is an absolute certainty.
🔴 There should be no doubt in your minds that pure love is omnipresent and supreme. It contains the power to accomplish the eternal quest of life. It facilitates uprooting the vices and allaying the agility, apprehensions and
tensions of mind. Selfless love is a divine virtue, a preeminent source of auspicious peace and joy.
🌹 -Akhand Jyoti, Oct. 1943
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Labels: जीवन जीने की कला
👉 मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है

🔴 जब तक आप दूसरों पर आश्रित रहते हैं या समझते हैं कि हमारे कष्टों को कोई और दूर करेगा, तब तक बहुत बड़े भ्रम में हैं। जो उलझनें आपके सामने हैं, उनका दु:खदायी रूप अपनी त्रुटियों के कारण है। उन त्रुटियों को दूर करके आप स्वयं ही अपनी उलझनें सुलझा सकते हैं।
🔵 संसार में सफलता प्राप्त करने की आकांक्षा के साथ ही अपनी योग्यता में वृद्धि करना भी आरंभ कीजिए। आपका भाग्य किस प्रकार लिखा जाए, इसका निर्णय करते समय विधाता आपकी आतंरिक योग्यताओं की परख करता रहता है। उन्नति करने वाले गुणों को यदि अधिक मात्रा में जमा कर लिया गया है, तो भाग्य में उन्नति का लेखा लिखा जाएगा और यदि उन्नायक गुणों को अविकसित पड़ा रहने दिया गया है, दुर्गुणों को, मूर्खताओं को अंदर भर कर रखा गया है, तो भाग्य की लिपि दूसरी होगी।
🔴 विधाता लिख देगा कि `इसे तब तक दु:ख-दुर्भाग्यों में ही पड़ा रहना होगा, जब तक कि योग्यताओं का संपादन न करे।’ अपने भाग्य को जैसा चाहें वैसा लिखाना, अपने हाथ की बात है। यदि आप आत्मनिर्भर हो जाएँ, जैसा होना चाहते हैं उसके अनुरूप अपनी योग्यताएँ बनाने में प्रवृत्त हो जाएँ, तो विधाता को विवश होकर अपनी मनमरजी का भाग्य लिखना पड़ेगा। जब आत्मविश्वास के साथ सुयोग्य मार्ग की तलाश करेंगे, तो वह किसी न किसी प्रकार मिल कर ही रहेगा।
🌹 -अखण्ड ज्योति -सितम्बर 1943
👉 You are the Architect of Your Destiny
🔵 If you depend upon others or look for someone’s help in the moments of difficulty, you must be living under some illusion. Otherwise, you would identify the root-cause of the problems you are facing and analyze your own vices and flaws that might have been responsible for those troubles. By overcoming those drawbacks and weaknesses, you would be best equipped to resolve or get rid of most of your problems on your own.
🔴 With the aspiration of being progressive and successful, you should also begin adopting virtuous tendencies and sharpening and enhancing your potentials. Your destiny is indeed written according to your intrinsic nature, inner qualities. Intense impressions of your tendencies, sentiments and thinking and conduct, account for shaping of your inner personality, which is attributed to be the architect of your future evolution. God’s system works according to – “you harvest what you have sown”.
🔵 If good qualities, abilities are not cultivated by you, and the seeds of virtues are left in a virgin (dormant) state within your self, and instead, negative tendencies, follies, untoward habits are allowed to accumulate and grow, God’s rule will formulate your destiny as full of sufferings; you will not have a good fate or hopes in future unless and until you refine yourself and inculcate the potentials of elevation. So it is in fact in your own hand to design your destiny.
🔴 If you awaken your self-confidence, set high ideals as your goal and sincerely endeavor to make yourself capable and deserving for that goal, God’s script will indeed destine you to have a bright and successful life accordingly. If you think wisely, know yourself and earnestly search for the illumined goal, you will certainly find the righteous path to achieve it at the right moment.
🌹 -Akhand Jyoti, April 1943
Posted by AWGP Shantikunj Haridwar at 11:54:00 am
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Labels: जीवन जीने की कला
👉 किसी परिस्थिति में विचलित न हों

🔴 जीवन में कई अवसरों पर बड़ी विकट परिस्थितियाँ आती हैं, उनका आघात असह्य होने के कारण मनुष्य व्याकुल हो जाता है और अपनी विवशता पर रोता-चिल्लाता है। प्रिय और अप्रिय घटनाएँ तो आती हैं और आती ही रहेंगी।
🔵 ऐसे अवसरों पर हमें विवेक से काम लेना चाहिए। ज्ञान के आधार पर ही हम उन अप्रिय घटनाओं के दु:खद परिणाम से बच सकते हैं। ईश्वर की दयालुता पर विश्वास रखना, ऐसे अवसरों पर बहुत ही उपयोगी है। हमारा ज्ञान बहुत ही स्वल्प है इसलिए हम प्रभु की कार्यविधि का रहस्य नहीं जान पाते जिन घटनाओं को हम आज अप्रिय देख-समझ रहे हैं, वे यथार्थ में हमारे कल्याण के लिए होती हैं।
🔴 हमें समझ लेना चाहिय कि हम अपने मोटे और अधूरे ज्ञान के आधार पर परिस्थितियों का असली हेतु नहीं जान पाते, तो भी उसमें कुछ-न-कुछ हमारा ति अवश्य छिपा होगा, जिसे हम समझ नहीं पाते। कष्टों के समय हमें ईश्वर की न्यायपरायणता और दयालुता पर अधिकाधिक विश्वास करना चाहिए। इससे हम घबराते नहीं और उस विपत्ति के हटने तक धैर्य धारण किए रहते हैं। संतोष करने का शास्त्रीय उपदेश ऐसे ही समय के लिए है। कर्त्तव्य करने में प्रमाद करना, संतोष नहीं वरन् आई हुई परिस्थिति में विचलित न होना, संतोष है। संतोष के आधार पर कठिन प्रसंगों का आधार पर हल्का हो जाता है।
🌹 -अखण्ड ज्योति -अप्रैल 1943
👉 Do Not Panic or Perplex
🔵 Life is full of challenges and testing moments! Many a times the adverse circumstances are so intense that one just can’t bear them, he loses patience, gets anxious and panicked; cries on his destiny and helplessness… But this doesn’t solve the problem. The only source of definite support in such cases is – prudence and patience.
🔴 Ups and downs, good and bad experiences are natural phases of human life. We must remember this fact and convince ourselves of the truth that wisdom and pure knowledge (gyana) are the only keys to conquer the agonies caused by the tides of adversities or tragedies. Firm faith in God’s grace and justice is a must in such testing moments of sufferings. We must understand that our knowledge is too limited to grasp the system of God. Whether we realize it at that time or not, the circumstances and experiences that appear so painful to us also occur in fact for our welfare only.
🔵 Because of our half or illusory knowledge and narrow attitude, we cannot grasp the real cause or purpose behind the happenings in our life. We must accept it that major cause of our agonies and anxiety is our ignorance; we want everything to conform to our expectation, our favor. But the course of life has many dimensions, beyond our perception. Faith in absolute justice and mercy of the Omniscient God is all the more important in the moments of hardships and pains.
🔴 This gives us instant courage and light and helps maintain our calm without which we can’t even think properly. All religious scriptures preach the importance of the feeling of content and peace in all circumstance. It is indeed the nectar source of annulling all worries and panics even in the difficult, tragic situations. Adoption of peace, patience and satisfaction does not mean that you should not transact your duties or progress in your life. Rather, it implies that you should complete all your tasks, all duties, with mental stability and calm and a sense of inner faith in all circumstances.
🌹 -Akhand Jyoti, April 1943
Posted by AWGP Shantikunj Haridwar at 9:55:00 am
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Labels: जीवन जीने की कला
👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 25 Sep 2016

🔴 महत्त्वपूर्ण सफलताएँ न तो भाग्य से मिलती हैं और न सस्ती पगडण्डियों के सहारे काल्पनिक उड़ानें उड़ने से मिलती हैं। उसके लिए योजनाबद्ध अनवरत पुरुषार्थ करना पड़ता है। योग्यता बढ़ाना, साधन जुटाना और बिना थके, बिना हिम्मत खोये अनवरत श्रम करते रहना यह तीन आधार ही सफलताओं के उद्गम स्रोत हैं।
🔵 यह सच है कि संकल्प के अभाव में शक्ति का कोई महत्त्च नहीं है। उसी प्रकार यह भी सच है कि शक्ति के अभाव में संकल्प भी पूरे नहीं होते। केवल संकल्प करते रहने वाला निरुद्यमी व्यक्ति उस आलसी व्यक्ति की तरह कहा जाएगा जो अपने पास गिरे हुए आम को उठाकर मुँह में भी रखने की कोशिश नहीं करता और इच्छा मात्र से आम का स्वाद ले लेने की आकाँक्षा करता है।
🔴 आलस्य से घिरा शरीर और प्रमाद से आच्छादित मन जो भी काम करता है वह आधा-अधूरा, लँगड़ा, काना, कुबड़ा और फूहड़ होता है। मात्रा भी उसकी अति स्वल्प रहती है। उत्साही और स्फूर्तिवान् व्यक्ति जितनी देर में जितना काम बहुत ही सुंदर स्तर का कर लेता है, उसकी तुलना में आलस्य, प्रमादग्रस्त व्यक्ति आधा-चौथाई भी नहीं कर पाता और जो करता है वह भी ऐसा बेतुका होता है कि उससे तो न करना अधिक अच्छा रहता।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
Posted by AWGP Shantikunj Haridwar at 9:48:00 am
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Labels: आत्मचिंतन के क्षण
👉 दो की लड़ाई तीसरे का लाभ

एक बार एक सिंह और एक भालू जंगल में अपने शिकार की तलाश में घूम रहे थे। दोनों ही भूख से व्याकुल थे। अचानक उन्हें एक हिरन का बच्चा दिखाई दिया। दोनों ने एक ही बार आक्रमण कर उस हिरन के बच्चे को मार दिया। परंतु बच्चा इतना छोटा था कि वह दोनों में से किसी के लिए भी पर्याप्त भोजन नहीं था।
बस, फिर क्या था, सिहं और भालू आपस में बुरी तरह लड़ने लगे। दोनों का क्रोध इतना बढ़ा कि बुरी तरह एक दूसरे को नोचने खसोटने लगे। दोनों ही शिकार को अकेले खाना चाहते थे। बंटवारा उन्हें कुबूल नहीं था। इस झगड़े में वे बुरी तरह घायल हो गए और लहूलुहान होकर अपनी-अपनी पीठ के बल लेट गए और एक दूसरे पर गुर्राने लगे। वे इतनी बुरी तरह घायल हो गए थे कि अब उनमें उठने की शक्ति भी नहीं रह गई थी।
तभी एक होशियार लोमड़ी उधर से गुजरी। उसने उन दोनों को घायल अवस्था में पड़े हुए देखा। उनके बीच एक मरे हुए हिरन के बच्चे को देखकर लोमड़ी सब कुछ समझ गई।
बस, उसने सीधे उन दोनों के बीच घुस कर हिरन के बच्चे को खींच लिया और झाडि़यों के पीछे चली गई।
सिंह और भालू तो इतनी दयनीय स्थिति में थे कि अपने हाथ-पैर भी नहीं हिला सकते थे। वे दोनों लाचार से लोमड़ी को अपना शिकार ले जाते देखते रहे।
अंत में सिंह ने कहा- ”इतनी छोटी सी बात पर इतनी बुरी तरह लड़ना हमारी मूर्खता थी। यदि हमारे भीतर जरा भी बुद्धि होती तो हम समझौता कर लेते। हम चाहते तो शिकार का बंटवारा भी कर सकते थे। लेकिन यह हमारे लालच का परिणाम है कि हम आज इस स्थिति में पहुंच गए हैं कि एक लोमड़ी हमारे शिकार को खींच ले गई।“
यह सुनकर भालू ने भी सिर हिलाया -”हां दोस्त, तुम ठीक कह रहे हो।“
निष्कर्ष- दो की लड़ाई का लाभ सदा तीसरा कोई और ही उठाता है।
Posted by AWGP Shantikunj Haridwar at 7:56:00 am
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Labels: कहानियां
सोमवार, 19 सितंबर 2016
👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 20 Sep 2016

Posted by AWGP Shantikunj Haridwar at 10:09:00 pm
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Labels: प्रेरणादायक प्रसंग
👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 20 Sep 2016

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Labels: आज का सद्चिंतन
👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 21 Sep 2016

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Labels: प्रेरणादायक प्रसंग
👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 21 Sep 2016

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Labels: आज का सद्चिंतन
👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 22 Sep 2016

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👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 22 Sep 2016

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👉 Prernadayak Prasang प्रेरणादायक प्रसंग 26 Sep 2016

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👉 Aaj Ka Sadchintan आज का सद्चिंतन 26 Sep 2016

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👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 24 Sep 2016

🔴 गृहस्थाश्रम विषय भोग की सामग्री नहीं, स्वार्थमयी लालसा और पापमयी वासना का विलास मंदिर नहीं, वरन् दो आत्माओं के पारस्परिक सहवास द्वारा शुद्ध आत्म-सुख, प्रेम और पुण्य का पवित्र प्रासाद है। वात्सल्य और त्याग की लीलाभूमि है। निर्वाण प्राप्ति के लिए शान्ति कुटीर है।
🔵 भोगवादी दृष्टिकोण वाले समाज में सांस्कृतिक गतिविधियों का अर्थ भी नाच-गाने, कामोत्तेजना और सस्ते मनोरंजन तक सिमट कर रह गया है, किन्तु वास्तविक सांस्कृतिक गतिविधि वह है जो व्यक्ति को सांस्कृतिक चेतना से संपन्न, सुसंस्कारित बनाए। उसमें सिद्धान्तों, विचारों की समझ पैदा करे और सही दृष्टि दे। जब तक व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने की ओर ध्यान नहीं दिया जाएगा, उसकी भौतिक वृत्तियों को ही प्रधानता देकर उभारा-उछाला जाता रहेगा तब तक समाज में पशु प्रवृत्तियों का प्राधान्य भी बना ही रहेगा।
🔴 हमें अपना, अपने बच्चों का, अपने समाज का पौरुष नष्ट होने से बचाना अभीष्ट हो तो कामुकता की प्रवृत्तियों से बचाव करना भी आवश्यक है। इनके द्वारा जो हानि हमारी हो सकती है उन पर बार-बार विचार करें, उसके खतरे से जनसाधारण को सचेत करें और यह प्रतिज्ञा करें-करावें कि हम अपने व्यक्तिगत जीवन में कामुक प्रवृत्तियों से दूर रहकर नारी मात्र के प्रति परम पवित्र भावनाएँ रखेंगे। अश्लीलता के नरक से बचकर संयमशीलता के स्वर्ग की ओर कदम बढ़ाना हम सबके लिए नितान्त आवश्यक है।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 23 Sep 2016

🔴 महामानव ही किसी युग के समाज की वास्तविक सम्पदा होते हैं। उनकी उदारता एवं चरित्र निष्ठा से प्रभावित होकर लोग अनुकरण के लिए तैयार होते हैं। श्रेष्ठता का संतुलन उन्हीं के प्रयासों से बना रहता है। उत्कृष्ट एवं उदात्त संवेदनाओं को अपनाकर ही कोई महामानव बन पाता है। इसके बिना कितनी ही बुद्धिमत्ता एवं सम्पदा रहने पर भी मनुष्य स्वार्थ परायण ही बना रहता है। उसकी क्षमता निज के छोटे दायरे में ही अवरुद्ध बनी पड़ी रहती है और रुके हुए जोहड़ के सड़े पानी की तरह दुर्गन्ध फैलाती है।
🔵 प्रमादी अधिक घाटे में रहते हैं। शरीर कोल्हू के बैल की तरह चलता रहता है, पर वह सब बेगार भुगतने एवं भार ढोने की तरह होता है। फलतः कर्म कौशल के उत्साह भरे आलोक की झाँकी नहीं मिलती। किसी कार्य को पूरे मनोयोग के-उमंग और उत्साह के साथ न किया जाय तो उसमें विद्रूप, अधूरापन ही परिलक्षित होता रहेगा। ऐसे कर्मों को कुकर्म तो नहीं, पर अकर्म अवश्य ही कहा जाएगा। वे काने, कुबड़े, लँगड़े, लूले और कुरूप होते हैं, उनसे कर्त्ता को श्रेय प्राप्त होना तो दूर, उलटे उपहासास्पद बनना पड़ता है।
🔴 जिस भी कार्य में, जिस भी दिशा में प्रवीणता प्राप्त करनी हो उसका उत्साह एवं तत्परतापूर्वक दैनिक अभ्यास करना नितान्त आवश्यक है। किसी बात को सुन-समझ भर लेने से कोई काम नहीं बनता। प्रवीणता तब आती है, जब उन कार्यों को दैनिक अभ्यास में प्रमुखता दी जाय और उन्हें लम्बे समय तक लगातार जारी रखा जाय।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 22 Sep 2016

🔴 उच्च स्तरीय आदर्शों को प्राप्त करने के लिए मन को नियोजित कर सकना और उसे बलपूर्वक अभीष्ट लक्ष्य में प्रवृत्त किये रहना प्रौढ़ चेतना का ही काम है। उसी में यह सामर्थ्य है कि इन्द्रियों को विलासी लिप्सा से विरत रहने को फौजी आदेश देने और उनका पालन कराने में सफल हो सके। आलस्य शरीर की जड़ता और प्रमाद मन की जड़ता है। इसे उलटकर चित्त शक्ति का अनुशासन स्थापित करना आंतरिक प्रगल्भता के अतिरिक्त और किसी आधार पर संभव नहीं हो सकता।
🔵 प्रोत्साहन अपने आप में एक चमत्कार होता है। प्रशंसा और प्रोत्साहन से मनुष्य अपनी शक्ति और सामर्थ्य से कई गुना काम कर जाता है। प्रोत्साहन और प्रशंसा वह जादू की छड़ी है जिसको छूकर साधारण बंदर महावीर बन जाता है। नास्तिक छात्र नरेन्द्र, स्वामी विवेकानंद हो जाता है। कृष्ण के प्रोत्साहन से साधारण ग्वाल-बालों ने गिरि-गोवर्धन उठाने में सहयोग दिया। हम भी बिना एक पैसा खर्च किए दूसरों का भारी उपकार करने का यह गुण अपने में विकसित करके परमार्थ का पुण्य प्राप्त करते रह सकते हैं।
🔴 आज सभ्यता के प्रति अनास्था उत्पन्न हो रही है। अवज्ञा और उच्छृंखलता को शौर्य, साहस एवं प्रगतिशीलता का चिह्न माना जाने लगा है। नैतिक मर्यादाएँ उपहासास्पद और सामाजिक मर्यादाएँ अव्यावहारिक कही जाने लगी ंहंै। फलतः उद्धत आचरण और विकृत चिंतन के प्रति रोष प्रकट करने के स्थान पर उन्हें सहन करने तथा कभी-कभी तो प्रोत्साहन करने तक की प्रवृत्ति देखी जाती है। यह सब थोड़ी ही मात्रा में क्यों न हो, है भयंकर।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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👉 Aatmchintan Ke Kshan आत्मचिंतन के क्षण 21 Sep 2016

🔴 जिज्ञासा सबसे बड़ा गुण है। महत्त्वाकाँक्षी होना अच्छा है, परन्तु सही मार्ग खोजने के लिए, न कि बुराइयों को प्रोत्साहन देने के लिए। ज्ञान की भूख पूरी करने और सही दिशा की ओर ले जाने से मनुष्य विद्वान् बन जाता है।
🔵 जीवन में सफलता पाने के लिए आत्म- विश्वास उतना ही जरूरी है, जितना जीने के लिए भोजन। कोई भी सफलता बिना आत्म- विश्वास के मिलना असंभव है। आत्म-विश्वास वह शक्ति है, जो तूफानों को मोड़ सकती है, संघर्षों से जूझ सकती और पानी में भी अपना मार्ग खोज लेती है।
🔴 यह विचार सही नहीं है कि सम्पत्ति बढ़ जाने से मनुष्य का स्तर ऊँचा उठता है और प्रगतिशील परिस्थितियाँ बनती चली जाती हैं। यह तथ्य आंशिक रूप से ही सत्य है। भौतिक जीवन में अधिक सुविधा साधन मिलें यह बहुत अच्छी बात है, उससे विकास क्रम में सहायता मिलती है, पर यह यथार्थता भी भुला देने योग्य नहीं है कि घटिया व्यक्तित्व एक तो प्रगति कर ही नहीं सकेंगे, यदि कर भी लेंगे तो उपलब्ध साधनों का दुरुपयोग करके उलटे और विपत्ति के दलदल में फँसेंगे।
🌹 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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AWGP Shantikunj Haridwar

गायत्री परिवार ब्लोग जीवन जीने कि कला के, संस्कृति के आदर्श सिद्धांतों के आधार पर परिवार, समाज, राष्ट्र युग निर्माण करने वाले व्यक्तियों का संघ है।
इसमे आप आध्यत्मिक और व्यवहारिक कहानिया , आलेख और युग ऋषि पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य जी द्वारा लिखित मुख्य किताबो के अंशो से प्रेरणा पा सकते है।
युग निर्माण योजना का प्रधान उद्देश्य है - विचार क्रान्ति। मूढ़ता और रूढ़ियों से ग्रस्त अनुपयोगी विचारों का ही आज सर्वत्र प्राधान्य है। आवश्यकता इस बात की है कि (१) सत्य (२) प्रेम (३) न्याय पर आधारित विवेक और तर्क से प्रभावित हमारी विचार पद्धति हो। आदर्शों को प्रधानता दी जाए और उत्कृष्ट जीवन जीने की, समाज को अधिक सुखी बनाने के लिए अधिक त्याग, बलिदान करने की स्वस्थ प्रतियोगिता एवं प्रतिस्पर्धा चल पड़े। वैयक्तिक जीवन में शुचिता-पवित्रता, सच्चरित्रता, ममता, उदारता, सहकारिता आए। सामाजिक जीवन में एकता और समता की स्थापना हो।
इस संसार में एक राष्ट्र, एक धर्म, एक भाषा, एक आचार रहे; जाति और लिंग के आधार पर मनुष्य-मनुष्य के बीच कोई भेदभाव न रहे। हर व्यक्ति को योग्यता के अनुसार काम करना पड़े; आवश्यकतानुसार गुजारा मिले। धनी और निर्धन के बीच की खाई पूरी तरह पट जाए। न केवल मनुष्य मात्र को वरन् अन्य प्राणियों को भी न्याय का संरक्षण मिले। दूसरे के अधिकारों को तथा अपने कर्तव्यों को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति हर किसी में उगती रहे; सज्जनता और सहृदयता का वातावरण विकसित होता चला जाए, ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करने में युग निर्माण योजना प्राणपण से प्रयत्नशील है।
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